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बच्चों में स्क्विंट और एम्ब्लियोपिया होना

बच्चे के जन्म के बाद अक्सर पेरेंट्स सोचते हैं कि उनका बच्चा शारीरिक या मानसिक रूप से फिट है और उसे कोई भी समस्या नहीं हुई है। पर वास्तव में जन्म के तुरंत बाद भी बच्चों को कई प्रकार की समस्याएं हो सकती हैं जिनमें से एक स्क्विंट आई भी है। स्क्विंट आई का मतलब है आँखों में भेंगापन होना। बच्चे में स्क्विंट आई की समस्या होने से पेरेंट्स पर भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि आपके बच्चे को जन्म से ही या बाद में यह समस्या पता लगती है तो इस आर्टिकल में स्क्विंट और एम्ब्लियोपिया से संबंधित पूरी जानकारी दी हुई है जिससे आपको काफी मदद मिलेगी। 

स्ट्रॉबिस्मस या भेंगापन क्या है?

आँखों में अंतर होना भेंगापन या स्ट्रॉबिस्मस कहलाता है जिसमें बच्चे की दृष्टि क्रॉस्ड या टेढ़ी होती हैं। इसे स्क्विंट भी कहते हैं। यह दृष्टि से संबंधित समस्या है जिसमें दोनों आँखें एक समय में एक चीज पर फोकस नहीं कर पाती हैं। हमारी दोनों आँखों की मसल्स एक साथ कोऑर्डिनेटेड होती हैं और किसी चीज को देखने के लिए एक दिशा में मूव करती हैं। पर स्ट्रॉबिस्मस या आँखों में टेढ़ापन होने की वजह से यह नहीं हो पाता है। यदि एक बच्चे के आँखों की मसल्स एक साथ कोऑर्डिनेटेड होकर काम नहीं करती हैं तो दिमाग उसकी दृष्टि को एक समान करने में अक्षम होता है जिसकी वजह से आँखों में अंतर दिखाई देता है। 

स्क्विंट के प्रकार

स्क्विंट के कई प्रकार होते हैं और बच्चों में टेढ़ी नजर होने के कुछ प्रकार निम्नलिखित हैं, आइए जानें; 

  1. नजर टेढ़ी होने की दिशाएं;

एसोट्रोपिया – जब दृष्टि अंदर की तरफ मुड़ी होती है। 

एक्सोट्रोपिया – जब दृष्टि बाहर की तरफ मुड़ी हो। 

हाइपरट्रोपिया – जब दृष्टि ऊपर की ओर मुड़ी हो। 

हाइपोट्रोपिया – जब दृष्टि नीचे की ओर मुड़ी होती है। 

  1. लगातार स्क्विंट होना – इसमें बच्चे की नजर हर समय भेंगी रहती है। कभी-कभी स्क्विंट तब होता है जब आँखों में यह समस्या रुक-रुक कर दिखाई देती है।
  2. प्रत्यक्ष रूप से आँखें भेंगी होना: आँखें खुली रहने पर भेंगी होती हैं और लेटेंट स्क्विंट तब होता है जब आँखें बंद होने पर भी दृष्टि टेढ़ी हो।
  3. प्राकृतिक रूप से स्क्विंट होना: इस समस्या में आँखों की मसल्स सही से काम करती हैं लेकिन किसी भी दिशा में देखने पर नजर टेढ़ी रहती है।
  4. अयोग्य स्क्विंट होना: इसमें आँखें टेढ़ी होने की दिशा बदल सकती है। यानी दाईं ओर देखने पर आँखों का एलाइनमेंट सही दिखेगा लेकिन बाईं ओर देखने पर आँखों में स्क्विंट की समस्या नजर आ सकती है।

बच्चों में भेंगापन या स्ट्रॉबिस्मस होने के कारण

यद्यपि बचपन में ही आँखें भेंगी होने का कोई भी कारण नहीं है पर यह समस्या परिवार में हो सकती है। बच्चों में आँखें भेंगी तब भी हो सकती हैं जब आँखों में देखने की क्षमता कम हो, जैसे मोतियाबिंद और दूर की नजर कमजोर होना। कुछ मामलों में बच्चे को डाउन सिंड्रोम होने, प्रीमैच्योर डिलीवरी होने, सिर में चोट लगने या नर्व्ज या मसल्स को प्रभावित करने की समस्याओं के कारण उसकी आँखें भेंगी हो सकती हैं। कुछ बच्चों में जन्म से ही आँखें टेढ़ी होने की समस्या होती है या यह बिना किसी कारण के शुरूआती 6 महीनों में हो जाती है। बच्चे की आँखों में स्क्विंट कुछ अन्य कारणों से भी हो सकता है, जैसे मायोपिया, एस्टिग्मेटिज्म या हाइपरमेट्रोपिया जिसमें रोशनी रेटिना पर फोकस नहीं कर पाती है। 

बच्चों में भेंगापन या स्ट्रॉबिस्मस होने का पता कैसे करें?

बच्चों में स्थायी रूप से स्क्विंट की समस्या का पता लगाना बहुत आसान है क्योंकि इसमें दोनों आँखों की आई बॉल एक दूसरे से भिन्न होती हैं। इस बात का ध्यान रखें कि आपके बच्चे की आँखों में टेढ़ापन तब तक रहेगा जब तक उसकी आँख और दिमाग, एक दूसरे से कोऑर्डिनेटेड होकर फंक्शन नहीं करते हैं। ज्यादातर बच्चों में शुरूआती 6 महीनों के दौरान अनियमित रूप से स्क्विंट होता है जिससे कोई भी हानि नहीं होगी और 6 महीनों के बाद यह ठीक भी हो जाता है। यदि यह समस्या एक साल तक रहती है तो इसमें आपको डॉक्टर की मदद की जरूरत है। स्ट्रॉबिस्मस की समस्या को बच्चे की सामने से फोटो क्लिक करने पर भी देखा जा सकता है जिसमें आँखें सामने की ओर फोकस करती हैं। इस प्रकार से आँखों में अंतर होने का पता लगाया जा सकता है। 

बच्चे की दृष्टि में स्क्विंट के प्रभाव

यदि 3 से 4 महीनों के बाद भी बच्चे की आँखों में स्क्विंट की समस्या दिखाई देती है तो पेरेंट्स होने के नाते आपको इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि स्क्विंट का इलाज नहीं किया गया तो इससे बच्चे की दृष्टि हमेशा के लिए धुंधली हो सकती है या उसे डबल दिखाई दे सकता है। इससे बच्चे को लेजी आई भी हो सकता है जिसमें टेढ़ी या भेंगी आँखों से देखी हुई चीजों को दिमाग नजरअंदाज कर देता है। इससे बच्चे की दृष्टि स्वस्थ नहीं होती है। चूंकि बच्चे को ठीक से दिखाई नहीं देता है जिसकी वजह से वह खुद को आइसोलेट कर लेता है और समाज में शर्मिंदगी महसूस कर सकता है। बचपन में ही स्क्विंट को ठीक करना बेहतर होगा क्योंकि बच्चे की आयु बढ़ने पर दृष्टि से संबंधित समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। 

बच्चे में स्क्विंट का टेस्ट कैसे करें

बच्चों की आँखों में स्क्विंट का टेस्ट करना आसान नहीं होगा क्योंकि बच्चा इसके बारे में बता नहीं पाएगा। क्लिनिक में इसकी जांच कराने के लिए आपको ओफ्थल्मोलॉजिस्ट के पास जाना चाहिए जहाँ पर डॉक्टर बच्चे की एक आँख को बंद करके किसी की चीज या लाइट को देखने की क्षमता को चेक करेंगे। फिर वो कवर को हटाकर आई बॉल या आंख की पुतली के मूवमेंट को चेक करेंगे। इस टेस्ट में बच्चे को कोई भी असुविधा नहीं होगी और यह प्रभावी भी है। 

बच्चों में स्क्विंट का ट्रीटमेंट

बच्चों में भेंगी आँखों को ठीक करने के लिए निम्नलिखित ट्रीटमेंट का उपयोग करने की सलाह दी जाती है, आइए जानें;

आँखों की मसल्स में इंजेक्शन लगाना: यद्यपि इन इंजेक्शन का प्रभाव 3 महीनों तक रहता है पर यह आँखों की कमजोरी पर काम करता है जिससे आँखों को सीधा रखने में मदद मिलती है। 

सर्जरी: सर्जरी के दौरान आँखों के मूवमेंट को नियंत्रित करने वाली मसल्स को ठीक किया जाता है जिससे वे सीधी रहती हैं। विशेषकर बच्चों के लिए ऑपरेशन का उपयोग सबसे अंतिम विकल्प होना चाहिए। 

चश्मा: दूर की नजर कमजोर होने से आँखों में स्क्विंट की समस्या होती है इसलिए इसे ठीक करने के लिए चश्मे का उपयोग करना भी सबसे सही विकल्प है। 

एम्ब्लियोपिया या लेजी आई क्या है?

यदि शुरूआती आयु में ही स्क्विंट का ट्रीटमेंट नहीं होता है तो इससे आँख में एम्बिलियोपिया हो सकता है। एम्बिलियोपिया को लेजी आँख भी कहते हैं और यह तब होता है जब एक या दोनों आँखों की दृष्टि कमजोर या पूरी तरह से मंद हो जाती है। चूंकि प्रभावित आँखों से दिमाग में धुंधली तस्वीर बनती है जिसे समझ पाना कठिन हो जाता है। यह टेढ़ी नजर या मोतियाबिंद, ड्रूपी आईलिड, एस्टिग्मेटिज्म आदि की वजह से होता है। यदि इन समस्याओं को शुरूआत में ही ठीक कर दिया जाए तो बच्चे की दृष्टि पूरी तरह से ठीक हो सकती है और यदि इसे नजरअंदाज किया गया तो आँखों से दिखना बंद हो सकता है। 

बच्चे में एम्ब्लियोपिया को कैसे पहचानें?

चूंकि बच्चा अपनी एक हेल्दी आँख से दिन के सभी कामों को मैनेज कर लेता है इसलिए कई पेरेंट्स आँखों में एम्ब्लियोपिया की समस्या को समझ नहीं पाते हैं। बच्चा देखने के लिए प्रभावित आँख का उपयोग नहीं करता है और यह नॉर्मल आँख से अलग नहीं लगती है। अक्सर मांएं अपने बच्चे के शरीर के बदलावों के लिए सावधान रहती हैं इसलिए इस समस्या के बारे में उन्हें जल्दी पता लगने की संभावना ज्यादा है। यदि आपको एम्बिलियोपिया की जांच का तरीका नहीं पता है तो पेडियेट्रिक ऑप्थल्मोलॉजिस्ट से टेस्ट कराना ही सबसे बेहतर है। 

बच्चों में एम्ब्लियोपिया का टेस्ट कैसे करें?

यदि आप डॉक्टर के पास जाने से पहले घर में ही अपने बच्चे की आँखों में एम्ब्लियोपिया का टेस्ट करना चाहती हैं तो निम्नलिखित तरीका अपनाएं, आइए जानते हैं;

पहले आप अपने बच्चे की एक आँख को आई पैच से कवर करें और उसके सामने कोई खिलौना या टेडी बियर लाएं व इसे ऊपर, नीचे दाएं व बाएं मूव करें। इस दौरान ध्यान दें कि बच्चा खिलौने के मूवमेंट को समान दूरी से फॉलो करता है या खिलौने को समान दूरी से देखने के लिए अपनी आँखें घुमाता है या नहीं। यद्यपि ये संभावनाएं हैं कि आपका बच्चा इस एक्सरसाइज को करने में ज्यादा देर तक रूचि नहीं लेगा पर आप एक आँख से करने के बाद अगली बार दूसरी आँख का टेस्ट करें। 

बच्चे की आँखों में हुई समस्याओं के लिए आप पेडिएट्रिक ऑप्थल्मोलॉजिस्ट से अपॉइंटमेंट लें या फिर इस समस्या के सही डायग्नोसिस के लिए बच्चे की दृष्टि का स्क्रीनिंग टेस्ट कराएं। 

बच्चों में एम्ब्लियोपिया के ट्रीटमेंट

पेरेंट्स को अक्सर चिंता होती है कि वे अपने बच्चे की आँखों में स्क्विंट को कैसे ठीक करें पर शुरूआत में ही कुछ बेसिक स्टेप्स लेने से बच्चे में एम्ब्लियोपिया की समस्या ठीक हो सकती है। सबसे पहले आपको उस समस्या पर काम करना चाहिए जिसकी वजह से एम्ब्लियोपिया जैसी समस्या हुई है। बच्चे में पास से न दिखाई देने की समस्या, एस्टिग्मेटिज्म (दृष्टिवैषम्य) और मोतियाबिंद जैसी समस्याओं को ठीक करने के लिए दवा, चश्मे या सर्जरी की जरूरत होती है। यह बहुत जरूरी है कि बच्चे का दिमाग उसकी कमजोर दृष्टि के साथ प्रतिक्रियाओं को कोऑर्डिनेट करे जिससे बच्चा अच्छी तरह से देख सकता है। 

बच्चों की नजर कमजोर होने की वजह से एम्ब्लियोपिया की समस्या होती है और इसके लिए डॉक्टर चश्मा लगाने की सलाह देते हैं जो कैमरा के एक शार्प लेंस की तरह काम करता है और किसी भी चीज को फोकस करने में मदद करता है। इसकी मदद से दिमाग में एक स्पष्ट तस्वीर बनती है और आँखों व दिमाग के बीच के लिंक में सुधार होता है। 

डॉक्टर अक्सर दाहिनी आँख को कवर करने की सलाह देते हैं ताकि दिमाग कमजोर आँख पर फोकस कर सके। डॉक्टर दिन में एक बार आई ड्रॉप से हेल्दी आँख को कुछ समय के लिए धुंधला करने की सलाह भी दे सकते हैं। इससे भी दिमाग को कमजोर आँख पर फोकस करने में मदद मिलती है। इसका असर कई दिनों में दिखता है और इसमें सप्ताह, महीने या साल भी लग सकते हैं।

यदि शुरूआती समय पर ही टेढ़ी नजर या एम्ब्लियोपिया का डायग्नोसिस और इलाज करवा लिया जाए तो इसे ठीक भी किया जा सकता है। तुरंत इलाज कराने से आपके बच्चे को यह समस्या नहीं होगी और उसमें खुद के लिए नेगेटिविटी भी नहीं होगी। स्क्विंट से बच्चे की दृष्टि पर प्रभाव पड़ता है और यह समस्या जब तक ठीक नहीं हो जाती तब तक आपको अपने बच्चे का सपोर्ट करना चाहिए। 

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सुरक्षा कटियार

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