इन दिनों डायबिटीज एक बहुत ही आम बीमारी है लेकिन जब बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज होने का पता चलता है, तो माता-पिता की चिंताएं बढ़ जाती हैं और साथ ही वे निम्नलिखित सवालों के जवाब खोजना शुरू कर देते हैं;
‘शरीर में शर्करा के स्तर की वृद्धि’ को चिकित्सीय भाषा में डायबिटीज, मधुमेह या शुगर कहा जाता है। इसके प्रकार निम्नलिखित हैं:
हमारे शरीर में शर्करा का स्तर अग्नाशय (पैन्क्रियाज) द्वारा नियंत्रित होता है, जिसका मुख्य कार्य इंसुलिन का स्राव करना है। इंसुलिन एक हार्मोन है जो ग्लूकोज को ग्लाइकोजन में परिवर्तित करता है। ग्लूकोज हमारी दिनभर की गतिविधियों के लिए ऊर्जा उत्पन्न करता है लेकिन अतिरिक्त ग्लूकोज गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है और इसकी अधिकता को मधुमेह कहा जाता है।
टाइप 1 डायबिटीज एक ऐसी समस्या है जिसमें अग्नाशय द्वारा इंसुलिन का स्राव बहुत कम या बिलकुल नहीं होता है। शरीर में इंसुलिन न होने के वजह से, हमारा शरीर भोजन या शर्करा को पचाने में असमर्थ हो जाता है और शर्करा रक्त प्रवाह में रह जाती है। ऐसे में, रक्त में शर्करा की मात्रा अपनी निर्धारित स्तर से अधिक हो जाती है, जिससे जीवन को खतरा हो सकता है।
यह समस्या अक्सर बच्चों में पाई जाती है और कभी-कभी यह जन्म के बाद से हो जाती है। इसे स्व-प्रतिरक्षित बीमारी के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि इसमें हमारे शरीर की रक्षा प्रणाली हमारी स्वस्थ कोशिकाओं को नष्ट करती है। यदि इस समस्या की उचित देखभाल और चिकित्सीय इलाज नहीं किया गया तो यह गंभीर भी हो सकती है और शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान पहुँचा सकती है। इस प्रकार की डायबिटीज को “बच्चों में डायबिटीज”, “बच्चों में इंसुलिन की निर्भरता से डायबिटीज”, “बच्चों में ब्रिटल डायबिटीज” और “बच्चों में शुगर डायबिटीज” के रूप में भी जाना जाता है।
शोधकर्ताओं ने बच्चों में इसके होने के कुछ कारणों का पता लगाया है। इसका कारण संभवतः वायरल संक्रमण है, जो शरीर में इम्यून सिस्टम को कमजोर बना देता है या एक वंशानुगत घटक हो सकता है, जिसे इस प्रकार के मधुमेह होने का स्व-प्रतिरक्षित कारण समझा जा सकता है। हालांकि, इसके होने की कोई स्पष्ट वजह अभी भी अज्ञात है।
इसका ज्ञात कारण केवल विशेष बीटा कोशिकाओं (अग्नाशय में उत्पादित) को माना जाता है जो इंसुलिन को ले जाने का कार्य करती हैं और यह एंटीबॉडीज द्वारा नष्ट हो जाती हैं । सही मायने में इन कोशिकाओं में केवल अस्वस्थ/बाहरी कोशिकाओं को ही नष्ट होना चाहिए।
बच्चों में निम्नलिखित लक्षणों के प्रति सतर्क रहना और इन्हें देखना जरूरी है:
बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज का पता लगाने के लिए कुछ लक्षणों पर नजर रखना आवश्यक है, जैसे बार-बार पेशाब आना, अत्यधिक पानी पीना और बार-बार खाने की इच्छा होना। यदि आपको लगता है कि यह लक्षण एक निश्चित अवधि में नियमित रूप से होते हैं, तो चिकित्सक से संपर्क करने की सलाह दी जाती है।
इसकी पुष्टि के लिए चिकित्सक रक्त और मूत्र जांच करवाने की सलाह देते हैं। साथ ही यह भी सलाह दी जाती है कि आप घर पर ग्लूकोज मीटर का उपयोग न करें क्योंकि इसके परिणाम विश्वसनीय नहीं भी हो सकते हैं। इसके अलावा, एच.बी.ए.1सी जांच करवाना ठीक है, यह शरीर के पिछले 3 महीनों के औसत रक्त शर्करा के स्तर को इंगित करता है।
शर्करा के स्तर पर नजर रखने और उसे नियंत्रित करने के लिए नियमित रूप से चिकित्सक के पास जाना आवश्यक है।
शोध आंकड़ों के अनुसार टाइप 1 डायबिटीज के सबसे संभावित खतरे निम्नलिखित हैं, आइए जानें;
यदि आप में जेनेटिक मार्कर है, जिसका संबंध टाइप 1 डायबिटीज से है, तो आपमें टाइप 1 डायबिटीज होने की संभावना अधिक होती है। क्रोमोसोम 6 वह मार्कर है जो टाइप 1 डायबिटीज से संबंधित होता है। एच.एल.ए. (ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन) जटिलताएं इस डायबिटीज के प्रकार से जुड़ी होती हैं और यदि इन जटिलताओं के कई चिन्ह हो तो, आप में टाइप 1 डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है।
संक्रमण, जैसे जर्मन खसरा, कॉक्ससेकी और मंप्स रोग टाइप 1 डायबिटीज होने के प्रमुख कारण पाए गए हैं। यह वायरस इम्यून सिस्टम को कमजोर बनाते हैं और शारीरिक प्रतिक्रियाओं को शरीर के प्रतिकूल करते हैं, जिससे एक स्व-प्रतिरक्षित समस्या उत्पन्न हो जाती है।
इसमें परिवार का चिकित्सीय इतिहास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि माता-पिता दोनों को टाइप 1 मधुमेह है, तो उनके बच्चे में यह होने की संभावना अधिक होती है। इसके अलावा, यह देखा गया है कि माँ या भाई-बहनों की तुलना में पिता में टाइप 1 डायबिटीज होना खतरे को बढ़ाता है।
जिस वातावरण में हम रहते हैं वह हमारे शरीर को प्रभावित करता है। गर्म देशों में रहने वाले लोगों में टाइप 1 डायबिटीज होने का खतरा कम होता है क्योंकि वायरल संक्रमण की संभावना कम होती है। इसके विपरीत उन देशों में जहाँ ठंड अत्यधिक होती है वहाँ टाइप 1 मधुमेह के अधिक मामले पाए गए हैं।
कुछ स्व-प्रतिरक्षित रोग, जैसे ग्रेव्स रोग और मल्टीपल स्केलेरोसिस के कारण एक साथ स्थिति के रूप में टाइप 1 डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि इनमें संक्रमण का मुख्य कारण, जेनेटिक मार्कर एच.एल.ए. होता है।
टाइप 1 मधुमेह एक गंभीर बीमारी है। इसकी नियमित रूप से जांच व उचित देखभाल करना आवश्यक है। यदि इस समस्या पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया तो यह अनेक समस्याओं, कभी-कभी अल्पकालिक और कभी-कभी दीर्घकालिक रोगों को उत्पन्न कर सकती है।
कुछ अल्पकालिक जटिलताएं जो कम अवधि के लिए होती है वह निम्नलिखित हैं:
टाइप 1 डायबिटीज इंसुलिन पर निर्भर डायबिटीज होता है। शर्करा के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए भोजन से पहले नियमित रूप से इंसुलिन का इंजेक्शन लेने की जरूरत होती है। यदि इंसुलिन की मात्रा अत्यधिक हो जाती है तो यह शरीर को हायपोग्लायसेमिक स्थिति में पहुँचा सकती है, जिसका अर्थ है शरीर में बहुत कम शर्करा/ग्लूकोज होना।इस समस्या में रोगी बेहोश हो सकता है और अगर तुरंत इलाज नहीं किया गया तो रोगी कोमा में जा सकता है। हाइपोग्लाइसीमिया के कुछ लक्षण निम्नलिखित हैं:
यह समझना जरूरी है कि यदि आपको इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देते हैं तो इंसुलिन का उपयोग न करें। ऐसे में बच्चे को अस्पताल ले जाने की सलाह दी जाती है।
हाइपोग्लाइसीमिया 3 चरणों में हो सकता है: हल्का, मध्यम और गंभीर। हल्के और मध्यम चरणों का इलाज शरीर के अन्य अंगों को ज्यादा नुकसान पहुँचाए बिना आसानी से किया जा सकता है। गंभीर हाइपोग्लाइसीमिया में अन्य अंग प्रभावित होते हैं जिनका उपचार नहीं हो सकता है।
प्रत्येक रोगी के लिए रक्त शर्करा की ऊपरी और निचली सीमाएं अलग-अलग होती हैं, कुछ बच्चे 60-70 के ग्लूकोज स्तर पर भी सामान्य हो सकते हैं लेकिन कुछ बच्चे समान स्तर पर हाइपोग्लाइसीमिया से ग्रसित हो सकते हैं।
यह सलाह दी जाती है कि अपने बच्चे के ग्लूकोज के स्तर को जानें और इन परिस्थितियों के लिए तैयार रहें। ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी जाती है जो शरीर में तत्काल शर्करा के स्तर को बढ़ाते हैं, जैसे शर्करा-युक्त पेय, ग्लूकोज की गोलियां और इत्यादि। चिकित्सक आवश्यकता के अनुसार आपके बच्चे को तुरंत शर्करा को स्त्रावित करने की गोलियां देते हैं।
रात के दौरान बच्चे के सोते समय शर्करा के स्तर में उतार-चढ़ाव होता है। इसलिए यह जरूरी है कि आप रात के खाने से पहले उसे इंसुलिन की सही खुराक दें। इस स्थिति को नाइटटाइम हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है।
जब शरीर में इंसुलिन की कमी होती है, तो यह ग्लूकोज की कमी को पूरा करने के लिए शारीरिक वसा को नष्ट करता है। जब शरीर में वसा नष्ट हो जाता है तो यह किटोन उत्सर्जित करता है। शरीर में कीटोन्स की अधिकता रक्त को एसिडिक बना सकती है और यह समस्या गंभीर हो सकती है, डी.के.ए. के निम्नलिखित लक्षण हैं;
ऐसी कई सरल जांच हैं जो घर पर की जा सकती हैं और इससे यह पुष्टि की जा सकती है कि आपके बच्चे को कीटोएसिडोसिस है या नहीं। घरेलू ग्लूकोज मीटर का उपयोग करके बच्चे के ग्लूकोज के स्तर की जांच करें। यदि मान 250 मिलीग्राम/डी.एल. से ऊपर है, तो संभावना है कि बच्चे को डी.के.ए. हो सकता है। फार्मेसी में कीटोन के स्ट्रिप्स उपलब्ध हैं; इसका उपयोग बच्चे के मूत्र में कीटोन्स की जांच के लिए किया जाता है। यदि पट्टी गहरी बैंगनी रंग में बदल जाती है, तो यह इंगित करता है कि बच्चे में बहुत सारे किटोन हैं और उसे डी.के.ए. हो सकता है। यह सुनिश्चित करने के बाद कि बच्चे को डी.के.ए. है, इलाज के लिए तुरन्त चिकित्सक के पास जाएं। डी. के.ए. एक गंभीर समस्या है और बिना देरी के इसका उपचार किया जाना चाहिए।
यदि समय रहते शर्करा का स्तर ठीक से प्रबंधित नहीं होता है तो यह गंभीर दीर्घकालिक जटिलताओं का कारण बन सकता है। यदि 10 साल या उससे अधिक की अवधि तक शर्करा के स्तर को नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो यह जटिलताएं उत्पन्न होती हैं। दीर्घकालिक जटिलताओं में, रक्त वाहिकाएं प्रभावित होती हैं। छोटी रक्त वाहिकाओं की क्षति को माइक्रो-वास्कुलर (सूक्ष्म नाड़ी से संबंधित) जटिलताओं के रूप में जाना जाता है। बड़ी रक्त वाहिकाओं के नुकसान को मैक्रो-वास्कुलर (स्थूल संवहनी से संबंधित) जटिलताओं के रूप में जाना जाता है।
रक्त वाहिकाएं रक्त को शरीर के विभिन्न भाग में ले जाती हैं। यह वाहिकाएं जब क्षतिग्रस्त होती हैं तो यह शरीर के अन्य भाग जैसे आँखों, गुर्दे और यकृत को प्रभावित करती हैं। इसके परिणामस्वरूप, नसें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और इस स्थिति को ‘डायबिटिक न्यूरोपैथी’ कहा जाता है।
माइक्रोवास्कुलर जटिलताओं से ग्रसित रोगियों में निम्नलिखित लक्षण अत्यधिक पाए जाते हैं, जैसे;
जब बड़ी रक्त वाहिकाएं प्रभावित होती हैं, तो परिणामस्वरूप गंभीर हृदय रोग हो सकते हैं। बड़ी रक्त वाहिकाओं के क्षतिग्रस्त होने से हृदय की धमनियों में प्लेक जमा हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप हृदय का दौरा पड़ता है। यह भी सलाह दी जाती है कि रोगी न केवल अपने ग्लूकोज (मधु शर्करा) के स्तर का प्रबंधन करे, बल्कि इस जटिलता के प्रभावों को ठीक करने के लिए स्वस्थ व संतुलित आहार का भी सेवन करें।
टाइप 1 डायबिटीज का उपचार एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। यह समस्या अक्सर लोगों को जीवन-पर्यंत रहती है और इसलिए इसमें आपको धैर्य व ढृंढ़ता की आवश्यकता है। आपको ऐसा भी लग सकता है कि इस प्रबंधित करना असंभव है।
अपने बच्चे की मदद के लिए आपको डॉक्टर की सलाह की आवश्यकता पड़ सकती है।
चूंकि, टाइप 1 डायबिटीज की जटिलताओं में से कुछ गंभीर और जानलेवा हैं, इसलिए आपको चेतावनी के संकेतों की बिना प्रतीक्षा किए, नियमित रूप से ग्लूकोज की जांच करने की आवश्यकता है।
रक्त में शर्करा के स्तर की जांच के लिए त्वचा में एक सुई डालकर सी.जी.एम. किया जाता है। यह उपकरण नियमित रूप से की जाने वाली ग्लूकोज की जांच के सिर्फ एक विकल्प के रूप में है और यह बहुत सटीक परिणाम भी नहीं देता है।
टाइप 1 डायबिटीज के उपचार में इंसुलिन का उपयोग बहुत जरूरी है। चिकित्सक बच्चे की जरूरतों के आधार पर इंसुलिन के प्रकार को मिश्रित करके दे सकते हैं।
विभिन्न प्रकार के उपलब्ध इंसुलिन निम्नलिखित हैं;
आवश्यकताओं के अनुसार किसी रोगी को इंसुलिन देने के विभिन्न तरीके हैं:
जब बच्चा अस्वस्थ होता है, तो वह कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करता है और उसे इंसुलिन की कम खुराक की आवश्यकता हो सकती है। इस अवधि में हॉर्मोन बच्चे में रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ाते हैं और इसलिए अन्य दवाओं के साथ इंसुलिन का उपयोग करने से पहले शर्करा के स्तर की बारीकी पर नजर रखना महत्वपूर्ण है।
डाइबिटीज में सेवन किया जाने वाला भोजन बहुत उबाऊ होता है और एक बच्चे से इसका सेवन करना मुश्किल हो सकता है। बच्चों को जबरदस्ती आहार का सेवन करवाना भी आसान नहीं है लेकिन ऐसी स्थिति में एक अच्छा आहार विशेषज्ञ आपके बच्चे के लिए स्वस्थ और स्वादिष्ट भोजन के विकल्पों का सुझाव देकर आपके काम को आसान बना सकता है। टाइप 1 डायबिटीज से ग्रसित बच्चे को पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है, जिसमें फल, सब्जियां, अनाज और उच्च फाइबर शामिल हैं। किन्तु वसा और कार्बोहाइड्रेट के सेवन पर ध्यान देना अत्यधिक आवश्यक है। चिकित्सक की सलाह अनुसार चीनी और मिठाई को कभी-कभी आहार में शामिल किया जा सकता है।
बच्चे को शारीरिक व्यायाम या खेलने से प्रतिबंधित न करें। इस दौरान आपको सिर्फ यह ध्यान रखना है कि व्यायाम या खेल के बाद बच्चे में ग्लूकोज की जांच करें क्योंकि व्यायाम करने से शरीर में ग्लूकोज का स्तर कम हो जाता है। आपको इसी अनुसार इंसुलिन की खुराक को भी नियमित करना होगा। बच्चों की जीवनशैली में नियमित व्यायाम को शामिल करना एक अच्छी आदत है।
टाइप 1 डाइबिटीज एक लंबी चलने वाली बीमारी है और बच्चों पर इसका असर पड़ सकता है। इस समस्या से ग्रसित बच्चे अन्य बच्चों से अलग महसूस करते हैं क्योंकि उन्हें नियत भोजन करना होता है और नियमित रूप से इंसुलिन लेने की आवश्यकता होती है। अपने बच्चे को एक सपोर्ट ग्रुप में ले जाना अच्छा होगा जहाँ वे टाइप 1 डाइबिटीज वाले अन्य बच्चों से मिल सके।
शरीर ने कम शर्करा होने के कारण चिड़चिड़ापन हो सकता है। आपको यह समझने की आवश्यकता है कि जब आपका बच्चा बुरी तरह से व्यवहार करता है, तो यह उसकी भोजन/शर्करा की आवश्यकता के कारण हो सकता है।
साथ ही कुछ बच्चों में डिप्रेशन के लक्षण दिखाई देते हैं। यदि आप अपने बच्चे के व्यवहार में बार-बार बदलाव और एकांत व्यवहार का अनुभव करती हैं, तो आपको बच्चे के मानसिक स्थिति के लिए एक अच्छे डायबिटीज विशेषज्ञ से मिलने की जरूरत है। घर पर सामान्य जीवनशैली बदलने से बच्चे को सकारात्मक होने और उदासीनता को कम करने में मदद मिल सकती है।
डाइबिटीज वाले बच्चों को शिक्षित करें ताकि वे कम तनाव के साथ अपने डाइबिटीज का प्रबंधन करने के लिए तैयार हों।
बहुत सारी दवा बनाने वाली कंपनी ने उपकरण का निर्माण किया है (तकनीक का उपयोग भी) जो रोगियों के लिए जीवन को आसान बना सकते हैं। कुछ उपकरण जिनका उपयोग किया जा सकता है, वे निम्नलिखित हैं;
टाइप 1 डाइबिटीज को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है लेकिन आपको अपने बच्चे को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाने की आवश्यकता है। बच्चे से बात करना और उन्हें अपनी व्याकुलता व्यक्त करने की अनुमति देना, उनकी कुछ मानसिक बाधाओं को दूर करने में मदद कर सकते हैं।
निम्नलिखित संकेत बच्चे की मदद कर सकते हैं:
टाइप 1 डाइबिटीज के लिए कोई निवारक उपाय नहीं है। इसे रोकने का सबसे अच्छा तरीका टाइप 1 मधुमेह से जुड़े आनुवांशिक मार्करों के लिए एक स्वस्थ जीवनशैली और परीक्षण करना है।
डाइबिटीज के अन्य रूप भी हैं, जैसे:
टाइप 2 मधुमेह में, शरीर अपने द्वारा उत्पन्न होने वाले इंसुलिन का उपयोग करने में असमर्थ होता है। आहार को नियमित करके और सक्रिय रहकर भी इस स्थिति को आसानी से प्रबंधित किया जा सकता है। बहुत ही दुर्लभ मामलों में, बच्चों को इंसुलिन इन्जेक्शन की आवश्यकता हो सकती है।
जिन बच्चों की मांओं को गर्भकालीन डायबिटीज था, उन बच्चों को बाद में डायबिटीज होने का अधिक खतरा होता है। इससे बच्चों में मोटापे का खतरा भी बढ़ जाता है। यदि गर्भावस्था के दौरान माँ में मौजूद डायबिटीज को नजरअंदाज कर दिया जाता है तो यह शिशु में भी मेटाबोलिक प्रक्रिया को बदल देता है। इससे उनमें डायबिटीज या मोटापा होने का उच्च खतरा होता है। यह एक उपचार योग्य स्थिति है और एक अच्छे चिकित्सक लक्षणों को जल्दी समझ सकते हैं और इसका इलाज कर सकते हैं।
यदि आपको संदेह होता है तो आपको डॉक्टर से सलाह लेने की आवश्यकता पड़ सकती है;
आपके बच्चे को डायबिटीज होने की चिंता और भय आपको अभिभूत कर सकती है। हालांकि, सही देखभाल और ज्ञान के साथ इसे प्रभावी ढंग से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।
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