बच्चों के साथ जरूर जाएं भव्य दुर्गा पूजा व दशहरा मनाने इन स्थलों में

बच्चों के साथ जरूर जाएं भव्य दुर्गा पूजा व दशहरा मनाने इन स्थलों में

आपने कभी सोचा है कि अगर त्योहार न होते तो हमारा जीवन कितना नीरस और उबाऊ होता! ये तीजत्योहार ही तो हैं जो हमें रोजमर्रा की जिंदगी की एकरसता से छुटकारा दिलाते हैं। बच्चों के लिए तो त्योहार का अर्थ और ज्यादा मौजमस्ती होता है। आपको जरूर कभी न कभी न यह खयाल आया होगा कि जब त्योहार और छुट्टियां साथसाथ ही आते हैं तो क्यों न उनका आनंद कुछ अलग तरीके से लिया जाए। अपने बच्चों को भारत की संस्कृति से परिचय कराने के लिए छुट्टियों का सदुपयोग करते हुए एक ऐसी जगह उन्हें घुमाने ले जाया जाए जहाँ वे स्कूल और पढ़ाई से दूर रहने का मजा भी लें और पूरे उत्साह के साथ त्योहार भी मना सकें। हालांकि आपका यह विचार तब अधर में लटक जाता होगा जब किसी त्योहार विशेष को मनाने के लिए आपको घूमने हेतु कोई उपयुक्त जगह समझ नहीं आती होगी।

हम आपकी इस परेशानी का हल लाए हैं। कुछ दिनों में नवरात्रि और दशहरे का त्योहार आने वाला है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से दशमी तक चलने वाला और बुराई पर अच्छाई की विजय का यह पर्व हमारे देश के अलगअलग हिस्सों में अलगअलग तरीकों से मनाया जाता है। 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव को दुर्गा पूजा, नवरात्रि, विजयादशमी, दशहरा, दसरा इत्यादि अनेक नामों से हम जानते हैं। जितनी भिन्नता इसके नाम में है उतनी ही इसे मनाने में भी है। तो क्यों न इस बार बच्चों को लेकर ऐसी जगह जाकर दशहरा मनाएं जो उन्हें हमेशा याद रहे। यह लेख पढ़िए और जानिए कि वे कौन सी जगहें हैं जहाँ आप सपरिवार जाकर इस त्योहार का आनंद ले सकते हैं।

कोलकाता की दुर्गा पूजा

सबसे पहला नाम आता है रसगुल्ले और हावड़ा ब्रिज के लिए मशहूर कोलकाता का। नवरात्रि को यहाँ दुर्गा पूजा के नाम से जाना जाता है और यह पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है। यूं तो यह पूरे 10 दिन चलने वाला उत्सव है पर सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन कोलकाता के पूजा पंडालों की रौनक देखते ही बनती है। बंगाली मूर्तिकारों के हाथों से गढ़ी हुई देवी की भव्य और रमणीय मूर्तियों को देखने के लिए दूरदूर से लोग आते हैं। महिषासुर मर्दिनी के रूप में देवी दुर्गा और उनके साथ भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय, देवी सरस्वती और देवी लक्ष्मी की मूर्तियां भी होती हैं। शहर की तमाम गलियों में इन बड़ेबड़े पंडालों में बंगाली संस्कृति का दर्शन और लजीज बंगाली मिठाइयों का स्वाद लेते हुए आपको और आपके बच्चों को यह अनुभव आजीवन याद रहेगा।

मैसूर दसरा

विश्वविख्यात ‘मैसूर दसरा’ कर्नाटक राज्य का शासकीय त्योहार है। ऐसा माना जाता है कि मैसूर का नाम पहले ‘महिसुर’ था और यहीं चामुंडी पर्वत पर देवी चामुंडेश्वरी ने महिषासुर का वध किया था। इस प्रकार मैसूर में नवरात्रि व दशहरा मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। कहते हैं कि विजयनगर साम्राज्य के पराक्रमी राजाओं ने 15वीं शताब्दी में ‘मैसूर दसरा’ मनाने की परंपरागत शुरूआत की, तथापि लिखित तौर पर इसका इतिहास वर्ष 1610 से उपलब्ध है। इस प्रकार 400 से भी अधिक वर्षों से यह धार्मिक व सांस्कृतिक उत्सव अविरत चला आ रहा है। 10 दिनों के इस उत्सव में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम, कलावस्तुओं की प्रदर्शनी, खेल, परेड आदि आयोजित किए जाते हैं। 10वें दिन मैसूर की सड़कों पर पूरे विधिविधान के साथ बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाते हुए चामुंडेश्वरी देवी की प्रतिमा को एक सुंदर सजावट किए हुए हाथी पर बिठाकर लोगों के दर्शन के लिए घुमाया जाता है। इन सबके अलावा लोगों के सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र होता है ‘मैसूर पैलेस’, जिसकी 1,00,000 बल्ब से की गई भव्य रोशनाई अद्भुत होती है।

अहमदाबाद व वडोदरा का गरबा

नवरात्रि गुजरात का सबसे बड़ा त्योहार है और शायद इसलिए नवरात्रि और गरबा एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। गुजरात का यह लोक नृत्य अब पूरे देश में प्रसिद्ध और लोकप्रिय हो चुका है। वैसे तो कई दूसरे राज्यों में भी इन 9 दिनों के दौरान रातरात भर गरबा एवं डांडिया नृत्य की धूम मची रहती है। फिर भी अहमदाबाद और वडोदरा की नवरात्रि आज भी विशेष ही है। यहाँ पूरे 9 दिन देवी दुर्गा की पूजा के बाद रात भर गरबा खेला जाता है। बड़ों के साथसाथ रंगबिरंगे कपड़ों में सजे बच्चे भी पूरे उत्साह के साथ गरबा रास का आनंद लेते दिखाई देते हैं। वडोदरा का ‘यूनाइटेड वे ऑफ बड़ोदा गरबा’ के आयोजन के लिए पूरे गुजरात में सबसे विख्यात है। इसके अलावा ‘वडोदरा नवरात्रि फेस्टिवल’, ‘यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ोदा फैकल्टी ऑफ आर्ट्स’ और ‘माँ शक्ति गरबा’ में भी लोगों की भारी भीड़ रहती है। वहीं अहमदाबाद का ‘राजपथ क्लब’, ‘जी.एम्.डी.सी. ग्राउंड’ एवं ‘फ्रेंड्स गरबा’ नवरात्रि में लोगों को गरबा के जोश में सराबोर किए रहते हैं।

दिल्ली का रावण दहन

देश की राजधानी का एक अलग रूप देखना हो तो नवरात्रि और दशहरे में वहाँ जाइए। उत्तर प्रदेश और पंजाब की मिलीजुली संस्कृति का परिचय भी आपको यह शहर इसी दौरान कराएगा। यहाँ नवरात्रि के 9 दिनों के दौरान देवी जागरण और घरघर में कन्या भोजन का प्रचलन है। इसके अलावा दिल्ली में अनगिनत जगहों पर रामलीला का आयोजन होता है जिसमें पूरी राम कथा बहुत ही सुंदर तरीके से प्रदर्शित की जाती है। ‘रावण दहन’ दिल्ली की विशेष पहचान है। ‘रामलीला मैदान’, ‘लाल किला मैदान’ और ‘सुभाष मैदान’ जैसी तमाम जगहों पर होने वाले रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन का देखने के लिए हजारों लोग सपरिवार यहाँ आते हैं।

वाराणसी की रामलीला

यूनेस्को ने वर्ष 2008 में रामलीला को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा दिया है। बच्चों को यदि बिना लागलपेट के और एकदम स्वाभाविक रूप में रामायण की कहानी दिखानी हो तो वाराणसी की रामलीला से बेहतर क्या होगा। दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक वाराणसी को सबसे पुरानी और वास्तव में पहली रामलीला के आयोजन का भी श्रेय प्राप्त है। ऐसा विश्वास है कि 477 साल पहले रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास जी ने यहाँ रामलीला की नींव डाली थी। इसके बाद 19वीं शताब्दी में काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने ‘रामनगर की रामलीला’ की शुरूआत की जो अनवरत रूप से आज भी हर वर्ष आयोजित की जाती है। विशेष बात यह है कि इसका प्रदर्शन किसी एक अकेले स्टेज पर नहीं किया जाता बल्कि लगभग पूरा वाराणसी शहर ही रामलीला मैदान में तब्दील हो जाता है। राम कथा के हर भाग के लिए दर्शक अलग स्थान पर जाते हैं जहाँ स्थाई रूप से अयोध्या, अशोक वाटिका, लंका जैसी अनेक जगहें बनाई हुई हैं। ‘रामनगर की राम लीला’ के बारे में सर्वाधिक आश्चर्यजनक बात इसका प्रदर्शन का तरीका है। यह देखना अविश्वसनीय होता है कि इसमें बहुत ही कम इलेक्ट्रिक लाइट, माइक और लाउडस्पीकर का उपयोग किया जाता है, जबकि दर्शक हजारों की संख्या में होते हैं। इसलिए अपने बच्चों को कथाकथन की इस अद्भुत कला से परिचित कराने के लिए वाराणसी जरूर जाइए।

तो अब जब आप जान गए हैं कि नवरात्रि और दशहरे पर बच्चों को लेकर कहाँ जाया जा सकता है। फिर इंतजार किस बात का है? लगाइए अपनी छुट्टियों का गणित और शुरू कीजिए तैयारियाँ।