टॉडलर (1-3 वर्ष)

लड़कियों के लिए पॉटी ट्रेनिंग

बच्चों का डायपर बदलना भी उसके पालन-पोषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को पॉटी और सुस्सू करने की आदत डलवाने के लिए उत्सुक रहते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि आप अपने छोटे बच्चों को सही समय पर पॉटी ट्रेनिंग या टॉयलेट ट्रेनिंग दें, यह समय से न तो पहले और न ही बाद में होना चाहिए। यदि आपकी बेटी है तो आपके लिए एक अच्छी खबर है, लड़कों की तुलना में लड़कियां इस प्रक्रिया में जल्दी निपुण हो जाती हैं। विशेषज्ञों के शोध से यह साबित हो चुका है कि लड़कियों की तुलना में लड़के पॉटी ट्रेनिंग लेने में अधिक समय लगाते हैं। इसलिए, यदि आप अपनी बेटी की पॉटी ट्रेनिंग के लिए अधिक चिंतित हैं, तो अपनी चिंताओं को छोड़ दें और खुश हो जाएं क्योंकि आपको बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। 

पॉटी ट्रेनिंग क्या है?

छोटे बच्चों को टॉयलेट में सुस्सू या पॉटी करने की आदत डलवाने को पॉटी ट्रेनिंग या टॉयलेट ट्रेनिंग कहा जाता है। छोटी आयु में एक शिशु को हमेशा डायपर में ही सुस्सू या पॉटी करने की आदत होती है। लेकिन जैसे वह बड़ा होता है और चलने-फिरने लगता है उन्हें पॉटी ट्रेनिंग देना जरूरी है और यह काम सही उम्र में किया जाना चाहिए। बच्चों को पॉटी ट्रेनिंग देने की शुरूआत के बाद से ही उन्हें टॉयलेट का उपयोग करना नहीं आ जाता है, वे इसे धीरे-धीरे सीखते हैं। डायपर का उपयोग बंद करने और टॉयलेट का सही उपयोग सिखाने की पूरी प्रक्रिया को पॉटी ट्रेनिंग कहा जाता है। 

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लड़कियों को पॉटी ट्रेनिंग देना कब शुरू करें?

चूंकि समान आयु के बच्चों में लड़कों की बजाय लड़कियों का ध्यान कम भटकता है जिस कारण से लड़कियों को पॉटी ट्रेनिंग देना सरल है और वे जल्दी सीख भी जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आपको उस सही समय की प्रतीक्षा करनी होगी जब आपकी बेटी टॉयलेट ट्रेनिंग के लिए तैयार है, आपको इसके आवश्यक संकेतों पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा यदि आपकी बच्ची अपने आस-पास के वातावरण में किसी भी बदलाव का अनुभव कर रही है तो आपको उसकी पॉटी ट्रेनिंग शुरू करने से पहले उसे अपने वातावरण के अनुकूल बनने का इंतजार करना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार लड़कियों के लिए पॉटी ट्रेनिंग की अनुमानित आयु 18 महीने से 3 वर्ष के बीच है।

लड़कियों को पॉटी ट्रेनिंग देना कैसे शुरू करें?

आपके दिमाग में एक उचित सवाल जरूर आया होगा कि ‘मैं अपनी बेटी की पॉटी ट्रेनिंग कैसे शुरू करूँ?’ यहाँ पर कुछ सुझाव दिए गए हैं जो सही निर्णय लेने में आपकी मदद कर सकते हैं:

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सही समय की प्रतीक्षा करें: सभी बच्चों में कुछ शारीरिक, व्यवहारिक और संज्ञानात्मक संकेत दिखते हैं जो इस बात को स्पष्ट करता है कि आपका बच्चा ट्रेनिंग के लिए तैयार है या नहीं । जब तक आपको वह संकेत नहीं दिखते तब तक प्रतीक्षा करें क्योंकि भले ही आप इसे पहले ही शुरू कर दें परंतु सबकी पॉटी ट्रेनिंग का समय समान ही रहता है।

एक योजना तैयार करें: यह जरूरी है कि आप इसे आजमाना शुरू करने से पहले भी इसकी पूरी योजना बना लें। आपकी योजना व्यापक होनी चाहिए और इसमें सभी कारकों पर विचार किया जाना चाहिए, जैसे ट्रेनिंग के लिए आवश्यक चीजें, बच्चे से कोई गलती हुई तो कैसे संभालना है और कब प्रक्रिया रोक देना है। डॉक्टर या डे-केयर प्रदाता से सलाह लेने के सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं और अनुभवों के अनुसार महत्वपूर्ण सुझाव भी मिल सकते हैं। उनके साथ संपर्क बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि आपकी योजना को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए उनका योगदान आवश्यक होगा।

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समय लगने दें: किसी ने ठीक ही कहा है, ‘शिष्टाचार आने में समय लगता है, और जल्दबाजी से कुछ भी नहीं होता है।’ इसलिए आप अपनी बेटी को इस नए कौशल के अनुकूल बनाने में उसकी क्षमता से ज्यादा जोर न दें। याद रखें सब बच्चे अलग होते हैं, कुछ जल्दी सीख जाते हैं और कुछ को सिखने में महीनों लग सकते हैं।  

बच्चे की प्रशंसा करें: हर एक प्रयास के लिए बच्चे की प्रशंसा करें। हर बार उसकी तारीफ करने से वह हर दिन इसे करने का प्रयास कर सकती है।

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समस्याओं के लिए तैयार रहें: पॉटी ट्रेनिंग की प्रक्रिया के दौरान आपको कई प्रतिकूल स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। यदि आपकी बेटी जल्दी नहीं सीख पा रही है तो अपना धैर्य न खोएं या उस पर गुस्सा भी न करें। आपकी कोई भी नकारात्मक टिप्पणी इस प्रक्रिया को धीमा कर सकती है या ऐसे व्यवहार से आपकी बेटी का आत्मविश्वास कम हो सकता है।

बच्चा पॉटी ट्रेनिंग के लिए तैयार है कैसे पता करें?

बच्चों में पॉटी ट्रेनिंग शुरू करने के विशेषज्ञों ने कुछ ऐसे संकेत बताए हैं जो पहली बार बने माता-पिता के अनुभवों को सरल बनाने में मदद कर सकते हैं। इन संकेतों को शारीरिक, व्यावहारिक व संज्ञानात्मक रूप में विभाजित किया है। आप अपनी बेटी की पॉटी ट्रेनिंग शुरू करने से पहले निम्नलिखित संकेतों को अवश्य देखें, आइए जानते हैं;

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शारीरिक संकेत: सबसे पहले देखें कि क्या आपकी बेटी ने चलना शुरू कर दिया है, क्या वह एक बार में ठीक से पेशाब करने लगी है और क्या वह पॉटी आने का संकेत पहले से देती है। इसके अलावा 2-3 घंटे तक या सोते समय बच्चे द्वारा सुस्सू न करना आपको बच्चे की पॉटी ट्रेनिंग की योजना बनाने के काम आ सकता है।

व्यवहारिक संकेत: आपको अपनी नटखट बेटी को पॉटी ट्रेनिंग देने के लिए तब तक इंतजार करने की जरूरत है जब तक वह किसी एक जगह पर कम से कम 5 मिनट के लिए शांति से न बैठ सके। विशेषज्ञ कहते हैं कि लड़कों की तुलना में लड़कियां इसे जल्दी करती हैं। उसे अपनी पैंट को थोड़ा बहुत ऊपर-नीचे करना भी आना चाहिए।

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यदि बच्चे को गीले डायपर में रहना पसंद नहीं है, जब वह पॉटी आने पर शारीरिक या मौखिक संकेत देने लगे तो यह पॉटी ट्रेनिंग के संकेतों में से एक है। इसके अलावा, यदि आपको लगता है कि आपकी बच्ची दूसरों की शौच संबंधी आदतों में दिलचस्पी दिखा रही है, तो उसकी पॉटी ट्रेनिंग की योजना बनाने का यह भी एक सही समय है। 

संज्ञानात्मक संकेत: 2 या 3 साल की आयु में पॉटी ट्रेनिंग शुरू करने के लिए संज्ञानात्मक विकास का उचित स्तर भी महत्वपूर्ण है। उन्हें शारीरिक संकेतों को समझने और जरूरत पड़ने पर खुद भी संकेत देने में सक्षम होना चाहिए।

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सरल और सीधे निर्देशों का पालन करने में सक्षम होना संज्ञानात्मक विकास का एक संकेत है, जो किसी भी ट्रेनिंग शुरू कराने से पहले जरूरी है। विशेषज्ञ इस बात पर भी जोर देते हैं कि जो बच्चे अपने खिलौनों को खुद ही व्यवस्थित करना शुरू कर देते हैं वे ख़ुद को साफ रखने हेतु अभ्यस्त होने के लिए तैयार हैं। उनके पास सुस्सू या पॉटी लिए कुछ सांकेतिक शब्द भी होने चाहिए, जिनका उपयोग जरूरत पड़ने पर वे कर सकें।

ऊपर बताए गए सभी संकेत माता-पिता को अपनी छोटी सी बेटी की पॉटी ट्रेनिंग शुरू करने के लिए सही समय निर्धारित करने में मदद कर सकते हैं।

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लड़कियों को पॉटी ट्रेनिंग देने के खास टिप्स

अपनी छोटी सी बेटी के लिए आपके द्वारा अपनाई गई पॉटी ट्रेनिंग के तरीके मजेदार या मनोरंजक हो सकते हैं, निम्नलिखित टिप्स इस प्रक्रिया को मनोरंजक बनाने में आपकी मदद कर सकते हैं, आइए जानते हैं;

अनुसरण करना:

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अक्सर बेटियां बड़े होकर पानी माँ जैसा बनना चाहती हैं इसलिए वे ज्यादातर मम्मी की ड्रेसिंग स्टाइल या मेकअप करने की नकल करती हैं। चूंकि बच्चियां अपनी माँ की नकल करना पसंद करती हैं इसलिए बेटी को माँ द्वारा पॉटी ट्रेनिंग देने या बेटी को टॉयलेट का उपयोग करते देखना भी एक बेहतर तरीका है। यदि कोई बड़ी बहन है आपकी छोटी बेटी यह तरीका अपनी बहन से भी सीख सकती है। 

आवश्यक चीजें खरीदें:

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पॉटी ट्रेनिंग की शुरुआत करने के लिए आपकी छोटी सी बेटी को बच्चों वाला पॉटी सीट खरीदकर दें जिसे वह अपना कह सकती है। बच्चों को टॉयलेट से परिचित कराने से पहले बच्चों वाली पॉटी सीट का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि बच्चों को टॉयलेट में चोट लगने का खतरा रहता है और उस पर लगातार नजर रखने की आवश्यकता पड़ती है। 

लेकिन यदि आप अपनी बेटी को सीधे टॉयलेट में बैठना सिखाना चाहती हैं, तो एक अडैप्टर सीट खरीदें जो आरामदायक होती है और बड़ी सीट में मजबूती से जुड़ जाती है। इसके अलावा बच्चे को पैर रखने के लिए एक स्टूल दें। वह इसका उपयोग स्वतंत्र रूप से ऊपर और नीचे चढ़ने के लिए भी कर सकती है।

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आप बच्चों के लिए पॉटी ट्रेनिंग से संबंधित चित्र वाली कुछ पुस्तकें और वीडियो भी बच्चे को दिखा सकती हैं। यह बाजार में कई जगह उपलब्ध हैं जिनमें से आप किसी एक को चुन सकती हैं।

उसे सहज महसूस करवाएं:

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पॉटी ट्रेनिंग के लिए बेटी को सहज महसूस कराने के अनेक तरीके हैं। सबसे पहले, पॉटी सीट पर उसका नाम लिखें या उसके पसंदीदा कार्टून के स्टीकर चिपकाएं और इसे अपने बच्चे के लिए पर्सनलाइज़ बनाएं। लगभग एक सप्ताह तक बच्चे को इससे खेलने दें। फिर बच्चे की पसंदीदा गुड़िया से उसका मन बहलाकर उसे सिखाएं कि पॉटी सीट का उपयोग कैसे किया जाता है। यह उसके लिए मनोरंजक हो सकता है। इसके बाद आप उसे पॉटी करने के लिए पॉटी सीट का खुद से उपयोग करने की सलाह भी दे सकती हैं। 

डायपर की बजाय पैंटी का उपयोग करें:

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उसकी पसंद की नई अंडरवियर खरीदने का वादा करके अपनी बेटी को पैंटी पहनने के लिए प्रेरित करें। बेटियां अक्सर अपनी अलमारी में नई चीजों को रखने और इसे आजमाने के लिए उत्साहित रहती हैं।

ट्रेनिंग कीसमय-सारणी तैयार करें:

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अपनी बेटी की प्री-स्कूल और डे-केयर की समय-सारिणी को ध्यान में रखते हुए, आपको एक अनुसूची तैयार करनी होगी और इसे प्री-स्कूल तथा डे-केयर प्रदाताओं को भी देनी होगी। आपको इस बारे में भी अपना मन बनाने की जरूरत है कि क्या आप डायपर और पैंटी बदल-बदल कर पहनाने का तरीका अपनाएंगी या सीधे पैंटी पहनाना शुरू करेंगी। विशेषज्ञों की मानें तो दिन के समय कपड़े की पैंटी पहनाना एक बेहतर विकल्प है, हालांकि रात में डायपर पहनाएं।

पोछना सिखाएं:

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पॉटी ट्रेनिंग के दौरान बेटी को कमोड या पॉटी सीट पर बैठना सिखाएं। ठीक से बैठने की आदत पड़ने के बाद, अगले कदम पर उसे पॉटी करने के बाद आंतरिक अंग धोना और पोछना सिखाएं। यह थोड़ा कठिन हो सकता है और इसे सीखने के लिए आपकी बेटी विशेषकर पॉटी करने के बाद थोड़ा अधिक समय ले सकती है। तो, सबसे पहले, उसे बताएं कि पेशाब करने के बाद आंतरिक अंग को ठीक से धोकर सुखाए।

डायपर के बिना रहने की आदत डालें:

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बच्चों को जब डायपर के बिना कुछ समय बिताने की अनुमति दी जाती है, तो वे शौचालय का उपयोग करने के लिए संकेत देना सीख जाते हैं। डायपर के साथ, बच्चों को कभी यह एहसास ही नहीं होता कि उन्हें सुस्सू या पॉटी करने की आवश्यकता कब है। इसलिए उन्हें डायपर न लगाना और दिन में स्वतंत्र रूप से घूमने देना, पॉटी ट्रेनिंग का एक महत्वपूर्ण कदम है।

सफल होने पर प्रशंसा करें और हार न मानें:

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बच्चे के हर एक पड़ाव को सफलतापूर्वक पूर्ण होने पर आप उसे पुरस्कार में एक स्टार, स्टीकर या विशेष मामलों में एक खिलौना भी दे सकती हैं। साथ इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है कि इस चरण में कुछ प्रतिकूल स्थितियां भी उत्त्पन्न हो सकती हैं। ऐसी स्थितियों को भी स्वीकार करें और किसी भी स्थिति के लिए बच्चे को डांटें नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि हार नहीं माननी चाहिए और कोशिश जारी रखनी चाहिए।

मनोरंजक बनाएं:

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बच्चे की पॉटी ट्रेनिंग को मजेदार बनाने के लिए पानी के मग में घुलने वाला रंग मिलकर रख दें। आप टॉयलेट में अपने बच्चे की पसंदीदा पुस्तकों व किताबों का रैक भी रख सकती हैं। पॉटी ट्रेनिंग के दौरान बच्चे को मनोरंजन में व्यस्त रखने के लिए आप उसे को खिलौने दे सकती हैं। 

अब रात में पॉटी ट्रेनिंग शुरू करें 

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जब आपकी छोटी सी बेटी दिन के समय में सुस्सू-पॉटी अच्छी तरह से करने में सक्षम हो जाए तो सुबह के समय में उसका डायपर की जांच करना शुरू करें और देखें कि यदि रात में उसने पेशाब तो नहीं की है। बच्चे को दिन के बजाय रात में टॉयलेट का उपयोग करना सिखाने में अधिक समय लग सकता है, लेकिन वह धीरे-धीरे सीख जाएगी। रात में उसका डायपर बदलने से पहले आपको इस बात का तब तक इंतजार करना होगा जब तक वह ज्यादा से ज्यादा 2 घंटे के लिए पेशाब को रोक कर रखने में सक्षम न हो। आप रात की पॉटी ट्रेनिंग में कुछ बदलाव कर सकती हैं जिससे यह प्रक्रिया जल्दी पूर्ण हो जाए, जैसे बच्चे को देर शाम या रात में तरल पदार्थ न दें। सोने से पहले बच्चे में सुस्सू जाने की आदत डालना भी एक अच्छा विचार है। 

लड़कियों को पॉटी ट्रेनिंग देते समय क्या करें और क्या न करें

क्या करें 

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  • सही समय की प्रतीक्षा करें।
  • उचित संकेतों पर ध्यान दें।
  • योजना तैयार रखें।
  • सुझावों के लिए डॉक्टर से परामर्श करें।
  • हर एक उपलब्धि के लिए बच्चे को पुरस्कृत करके उसे प्रेरित करें।
  • बच्चे के लिए उसकी पॉटी ट्रेनिंग को मनोरंजक बनाएं।

क्या न करें

  • जल्दबाजी न करें।
  • बहुत जल्द परिणाम की उम्मीद न करें।
  • कोई भी समस्या या गलती होने पर बेटी को न डांटें।
  • दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करके उसे हतोत्साहित न करें।

लड़कियों और लड़कों की पॉटी ट्रेनिंग में अंतर

विशेषज्ञों के अनुसार लड़कों की तुलना में लड़कियों को पॉटी ट्रेनिंग कराना ज्यादा आसान है क्योंकि बच्चों की समान आयु में लड़कियां, लड़कों से कम सक्रिय और चंचल होती हैं। लड़कों और लड़कियों की पॉटी ट्रेनिंग में निम्नलिखित अंतर हो सकता है, आइए जानें;

  • पोछना: एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि बेटी को विशेषकर पॉटी करने के बाद आगे से पीछे की ओर पोछना सिखाना चाहिए। यह उसे मूत्राशय या पेशाब नली के किसी भी संक्रमण से दूर रखेगा। पेशाब करने के बाद बेटी को अपने आंतरिक अंग ठीक से धोकर, पोछना या पानी सुखाना भी सिखाएं। लड़कों में ऐसा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  • नीचे की ओर झुक कर पेशाब करना: आपको अपनी बेटी को नीचे की ओर हल्का सा झुककर पेशाब करना सिखाने की आवश्यकता है ताकि उसके मुंह पर छीटें न आएं।

  • खड़े होकर पेशाब करना: लड़कियां भी लड़कों की तरह खड़े होकर पेशाब करने का प्रयास कर सकती है। शायद यह उसने अपने भाई या स्कूल में किसी लड़के को ऐसा करते देखा होगा। उसे कोशिश करने दें और ख़ुद से सीखने दें कि लड़कों की तरह खड़े होकर पेशाब करना असहज होता है। वह अंततः शौच संबंधी अपनी सभी क्रियाओं के लिए खुद ही बैठने लगेगी।

यह भी पढ़ें:

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सुरक्षा कटियार

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