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नवरात्रि की नौ देवियों का विस्तृत स्वरूप

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देश के विभिन्न मंदिरों व पूजा के प्रकारों में देवों के साथसाथ देवियों की भक्ति भी महत्वपूर्ण मानी गई है। वेद, पुराणों व पौराणिक कथाओं में देवी स्वरूप का भी एक विशेष स्थान है जो नारी की शक्ति व संवेदनशीलता, दोनों को दर्शाती है। जहाँ देवी की पूजा धन व ज्ञान की स्वामिनी के रूप में की जाती है, वहीं काली और आदिशक्ति रूप भी पूजनीय है।

नवरात्रि के त्योहार में 9 दिनों तक माँ दुर्गा की अनुकंपा और उनके हर स्वरूप का गुणगान किया जाता है तथा उनके हर रूप का एक विशेष महत्व है, आदि शक्ति के हर रूप के बारे में आइए जानते हैं।

नवरात्रि में देवी के 9 विस्तृत रूप

माँ दुर्गा, आदि शक्ति व माँ पार्वती का ही स्वरूप हैं, जो धरती पर अनेक रूपों में पूजनीय हैं। हमारे ग्रंथों में इनके हर रूप को विस्तार से बताया गया है। नवरात्रि के प्रत्येक दिन माँ दुर्गा के एक अलग रूप का महत्व होता है। आइए जानते हैं नवरात्रि के हर दिन की विशेषता को।

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1. माँ शैलपुत्री

नवरात्रि का सबसे पहला दिन माँ शैलपुत्री को समर्पित किया गया है। इनकी पूजा की शुरुआत घटस्थापना के साथ की जाती है। ग्रंथों के अनुसार, शिव की अर्द्धांगिनी माता उमा ने पर्वतों के राजा हिमावत और रानी मैनावती की बेटी के रूप में जन्म लिया था। शैलराज (पर्वतराज) हिमालय के यहाँ जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा, यह ‘देवी पार्वती’ के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। कमल समान नयन और अधरों पर मुस्कान लिए माता शैलपुत्री के माथे पर अर्द्धचंद्र दमकता है और वह अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल व बाएं हाथ में कमल पकड़े हुए हैं। अपने इस स्वरूप में बैल पर सवार होकर माँ शैलपुत्री अपने भक्तों का उद्धार करती हैं।

2. माँ ब्रह्मचारिणी

नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी को समर्पित किया गया है। हाथ में जप की माला व कमंडल पकड़े माँ ब्रह्मचारिणी श्वेत वस्त्रों से सुसज्जित रहती हैं। मुख पर तेज लिए माँ दुर्गा का यह रूप तप व साधना के लिए जाना जाता है । देवी का यह स्वरूप ब्रह्मचर्य और ज्ञान की शक्ति को भी दर्शाता है, यह देवी सिद्धि और शांति का वरदान देती हैं।

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3. माँ चंद्रघंटा

मुख पर मंद मुस्कान व पूर्ण चंद्र को प्रतिबिंबित करती माँ चंद्रघंटा शक्ति के रौद्र रूप में दर्शन देती हैं। शेर पर सवार इस देवी के माथे पर घंटे के समान बड़ी व चंद्र जैसी बिंदी चमकती है जिसके कारण देवी को माँ चंद्रघंटा के नाम से पुकारा जाता है। करुणा भाव से भी परिपूर्ण यह देवी अपने 10 हाथों में विभिन्न अस्त्रशस्त्रों को धारण किए साहस और वीरता को दर्शाती हैं। अपने भक्तों के सभी कष्टों को हर लेने वाली माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्रि के तीसरे दिन की जाती है।

4. माँ कुष्मांडा

माँ दुर्गा के चौथे रूप मे देवी कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। मुख पर मंद कांति लिए माँ अपनी अष्टभुजाओं में चक्र, गदा, धनुष, तीर, अमृत कलश, कमंडल और कमल धारण करती हैं। इसलिए इन्हें अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है। माँ कुष्मांडा अपने भक्तों के रोग, दोष, कष्ट और हानियां हर लेती हैं और उन्हें यश, कीर्ति व समृद्धि प्रदान करती हैं।

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5. माँ स्कंदमाता

नवरात्रि का पाँचवां दिन माँ स्कंदमाता को समर्पित किया जाता है, इस दिन हम सभी माँ स्कंदमाता की पूजा अर्चना करते हैं। स्कंदमाता का तात्पर्य श्री कार्तिकेय (स्कंद) अर्थात भगवान मुरुगन की माता है। इनका वाहन सिंह है और लाल वस्त्र धारण किए स्कंदमाता के चार हाथ हैं। माता अपने दोनों हाथ में कमल का पुष्प, एक हाथ में अपने पुत्र कार्तिकेय को गोद में लिए हुए हैं और दूसरे हाथ से माँ जग का कल्याण करती हैं। स्कंदमाता कमल के पुष्प पर भी विराजमान रहती हैं इसलिए इन्हें ‘देवी पद्मासना’ के नाम से भी जाना जाता है। देवी की पूजा करने वाले भक्तों को सुख, शांति व समृद्धि की प्राप्ति होती है।

6. माँ कात्यायनी

माँ कात्यायनी की पूजा नवरात्रि के छठे दिन की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि माँ पारंबा भगवती ने ऋषि कात्यायन की भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान के रूप में उनके घर में जन्म लिया था। ऋषि कात्यायन के नाम से ही देवी का नाम कात्यायनी पड़ा, यह देवी अर्थ, काम, मोक्ष व धर्म की देवी हैं। माँ कात्यायनी की चारों भुजाओं में अस्त्रशस्त्र व कमल शुशोभित हैं और यह देवी सिंह की सवारी करती हैं। इनकी उपासना से दुःख, संताप, भय व पाप नष्ट हो जाते हैं और यह देवी मन की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए ब्रज की गोपियों ने माँ कात्यायनी देवी की पूजा की थी और यह पूजा ब्रजभूमि के यमुना तट पर हुई थी जो ‘अधिष्ठात्री देवी’ की पूजा के नाम से प्रसिद्ध हैं।

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7. माँ कालरात्रि

तीन नेत्रों वाली माँ कालरात्रि, माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति हैं जिनकी पूजा नवरात्रि के सातवें दिन में की जाती है। इनका स्वरूप अत्यंत भयानक व क्रोधी है। माँ कालरात्रि की चार भुजाएं हैं, इनकी दो भुजाएं वर व अभय मुद्रा में हैं और अन्य दो भुजाओं में माँ ने राक्षसों का संहार करने के लिए तलवार और खड्ग पकड़ा हुआ है। माँ कालरात्रि के इस स्वरूप की उत्पत्ति दैत्य चंडमुंड का विनाश करने के लिए हुई थी और चंडमुंड नामक दानवों का विनाश करने पर ही वे ‘देवी चामुंडा’ कहलाईं। कहा जाता है माँ कालरात्रि ने रक्तबीज नामक एक शक्तिशाली दानव का संहार भी किया था।

8. माँ महागौरी

माँ महागौरी की पूजा नवरात्रि के दिन की जाती है। यह देवी श्वेत वस्त्र धारण किए वृषभ की सवारी करती हैं। चतुर्भुजाओं वाली माँ के दोनों हाथ वर व अभय की मुद्रा में हैं और उन्होंने अन्य दो हाथों में त्रिशूल और डमरू धारण किया हुआ है। पुराणों के अनुसार माँ महागौरी राजा हिमावत की पुत्री पार्वती ही हैं और यह देवी शैलपुत्री के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। माँ महागौरी ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए अत्यधिक कठोर तपस्या की थी ।

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9. माँ सिद्धिदात्री

माँ सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्रि के अंतिम दिन ‘नवमी’ को की जाती है। कमल पर विराजमान यह देवी सिंह की सवारी करती हैं। माँ सिद्धिदात्री के सांसारिक स्वरूप अनुसार इनकी चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा व कमल का पुष्प शुशोभित है। माँ का यह स्वरूप अत्यधिक आकर्षक और भक्तों को सिद्धि प्रदान करता है। माँ सिद्धिदात्री लोक कल्याण, ज्ञान व समृद्धि के लिए प्रसिद्ध हैं और इनकी कृपा से मनुष्य को अनेक प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

नवरात्रि की नौ देवियों का स्वरूप, क्रोध और करुणा का प्रतिबिंब है। एक ओर माँ दुर्गा अपने रूपों में ममतामयी करुणा की वर्षा करती हैं तो दूसरी ओर माँ की क्रोधाग्नि दैत्यों का सर्वनाश भी करती है। सर्वशक्ति माँ दुर्गा के अनेक रूपों को हम शतशत नमन करते हैं।

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