शिशु

नियोनेटल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (एनआरडीएस)

सामान्य प्रेगनेंसी की अवधि 40 हफ्तों की होती है। इन 40 सप्ताह के दौरान गर्भस्थ शिशु बढ़ता है और उसके दिमाग, दिल, लिवर, किडनी और फेफड़ों जैसे जरूरी अंगों का विकास होता है। अंगों का सही विकास कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे मां का अच्छा स्वास्थ्य और बच्चे को सही समय पर मिलने वाले जरूरी पोषक तत्व। 

कभी-कभी बच्चे के समय से पहले जन्म होने के कारण, सभी अंग पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते हैं और इसके कारण गंभीर कॉम्प्लिकेशन हो सकते हैं, जिन पर जन्म के बाद तुरंत ध्यान देने की जरूरत होती है। ऐसी ही एक समस्या है, नियोनेटल रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (एनआरडीएस)। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आगे पढ़ें। 

ADVERTISEMENTS

नियोनेटल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम क्या है?

नियोनेटल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम, जिसे हाईअलाइन मेंब्रेन डिजीज भी कहते हैं, एक ऐसी बीमारी है, जिसमें जन्म के समय बच्चे के फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं हुए होते हैं और वे सही तरह से काम नहीं कर पाते हैं। नवजात शिशु के जीवन के लिए स्वस्थ फेफड़े बहुत ज्यादा जरूरी हैं और नियोनेटल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे सामान्य रूप से सांस लेने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। 

एक न्यूबॉर्न बेबी में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के कारण और खतरे

नवजात शिशुओं में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के प्रमुख कारणों में से एक होता है, समय से पहले जन्म लेना। प्रीमैच्योर बच्चों में सर्फेक्टेंट की कमी होती है। यह एक ऐसा पदार्थ है, जो कि फेफड़ों के फैलने और सिकुड़ने को संभव बनाता है। यह अल्वेओली को भी खुला रखने में मदद करता है, जो कि फेफड़ों में स्थित छोटे एयर सैक होते हैं। इस कमी के कारण, सांस लेने में कठिनाई और फेफड़े की समस्याएं हो सकती हैं। 

ADVERTISEMENTS

यह सिंड्रोम, फेफड़ों के विकास से संबंधित अनुवांशिक समस्याओं के कारण भी हो सकता है। 

बच्चे की समय से पूर्व डिलीवरी के अलावा, नवजात शिशु में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के अन्य संभावित कारक नीचे दिए गए हैं: 

ADVERTISEMENTS

  • मेटरनल लेबर के बिना सी-सेक्शन डिलीवरी
  • मां को डायबिटीज होना
  • परिवार में इंफेंटाइल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम (आईआरडीएस) का इतिहास
  • गर्भ में जुड़वां या तीन बच्चे होना
  • पेरिनेटल एसफिक्सिया
  • गर्भावस्था के दौरान बच्चे तक जाने वाले खून के प्रवाह का अनियमित होना या उसमें कोई दोष होना

न्यूबॉर्न बच्चों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के संकेत और लक्षण

नवजात शिशु में नियोनेटल रेस्पीरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के ज्यादातर संकेत, बच्चे के जन्म के बाद तुरंत बाद दिख जाते हैं। लेकिन कभी-कभी इनके लक्षण दिखने में बच्चे के जन्म के बाद 24 घंटों तक का समय भी लग सकता है। वे आम संकेत और लक्षण जिन पर नजर रखनी चाहिए, वे निम्नलिखित हैं: 

  • सांस लेने के दौरान नथुनों में उभार
  • सांसों का तेज होना और उनके बीच की अवधि कम होना
  • त्वचा की रंगत नीली होना
  • सांस लेने के दौरान भारीपन
  • पेशाब की कमी
  • सांस लेने के दौरान घरघराहट की आवाज
  • हृदय की तेज गति
  • घरघराहट
  • अत्यधिक पसीना आना

इनमें से कुछ लक्षण अन्य बीमारियों या इंफेक्शन के लक्षण से मिलते-जुलते हैं। अगर आपके बच्चे में इनमें से कोई भी लक्षण दिख रहे हैं, तो आपको तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और इसके कारण का पता लगाने के लिए जरूरी टेस्ट करने चाहिए और स्थिति को ठीक करने के लिए सही कदम उठाने चाहिए। 

ADVERTISEMENTS

अगर समस्या का ध्यान न रखा जाए या समय पर सही कदम न उठाए जाएं, तो इससे खून में कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे बच्चे को कभी ठीक न होने वाला नुकसान हो सकता है। 

न्यूबॉर्न बच्चों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम की पहचान

इस स्थिति की पहचान के लिए, डॉक्टर लैब टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं, ताकि सांस लेने में तकलीफ को पैदा करने वाले अन्य संक्रमण की मौजूदगी का पता लगाया जा सके। बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर निम्नलिखित असेसमेंट कर सकते हैं और नीचे दिए गए टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं: 

ADVERTISEMENTS

  • बच्चे के बाहरी रूप, रंग और सांस की जांच, ताकि जन्म के समय शरीर की किसी असामान्य स्थिति का पता लगाया जा सके।
  • बच्चे के फेफड़ों की स्थिति की जांच के लिए छाती का एक्स-रे
  • खून में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर की जांच के लिए एक ब्लड गैस एनालिसिस करना और शरीर के तरल पदार्थों में अधिक एसिड की मौजूदगी की जांच करना
  • दिल की ऐसी किसी समस्या, जिसके लक्षण रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम से मिलते-जुलते हों,का पता लगाने के लिए, एक कार्डियोग्राफी भी की जा सकती है।

न्यूबोर्न बच्चों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम से जुड़े कॉम्प्लिकेशंस

नियोनेटल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के कारण कई तरह की जटिलताएं हो सकती हैं, जो कि जानलेवा हो सकती हैं और बच्चे के सामान्य विकास पर लॉन्ग लास्टिंग प्रभाव डाल सकती हैं। कुछ मामलों में, अगर स्थिति पर ध्यान न दिया जाए, तो यह घातक भी हो सकती है। इस स्थिति से जो अन्य जटिलताएं पैदा हो सकती हैं, वे नीचे दी गई हैं: 

  • अंधापन
  • ब्लड इंफेक्शन
  • शरीर में ब्लड क्लॉट्स
  • अपर्याप्त मानसिक विकास के कारण मानसिक मंदता
  • फेफड़ों और हृदय के आसपास के सैक में हवा का इकट्ठा होना
  • दिमाग और फेफड़ों में ब्लीडिंग
  • ब्रोन्कोपल्मोनरी डिस्प्लेसिया – सांस की एक बीमारी
  • न्यूमोथोरैक्स – फेफड़ों की खराबी

गंभीर रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के कारण, किडनी का फेल होना और अन्य जरूरी अंगों का असामान्य विकास भी हो सकता है। गंभीरता के आधार पर इसकी जटिलताएं हर न्यूबॉर्न बेबी में भिन्न हो सकती हैं। अपने डॉक्टर से संपर्क करना और बच्चे में होने वाली किसी जटिलता के समाधान को समझना बहुत जरूरी है। 

ADVERTISEMENTS

न्यूबॉर्न बच्चों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम का इलाज

नियोनेटल रेस्पीरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम के लक्षण आमतौर पर बच्चे के जन्म के तुरंत बाद दिखने लगते हैं। जो बच्चे इस स्थिति के साथ जन्म लेते हैं, उन्हें नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में ऑब्जर्वेशन के लिए रखा जाता है। 

इस मामले में स्थिति का समय पर इलाज शुरू होना सबसे ज्यादा जरूरी है। इलाज में देर होने से जटिलताएं पैदा हो सकती हैं, क्योंकि बच्चे के अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। 

ADVERTISEMENTS

इन्फेंट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चों के लिए उपलब्ध इलाज नीचे दिए गए हैं: 

1. सर्फेक्टेंट रिप्लेसमेंट थेरेपी

जिन मामलों में बच्चे में पर्याप्त सर्फेक्टेंट की कमी होती है, इस थेरेपी से उन्हें ब्रीदिंग ट्यूब के द्वारा सर्फेक्टेंट दिया जाता है। इससे सर्फेक्टेंट का फेफड़ों में जाना सुनिश्चित हो जाता है। यह दवा पाउडर के रूप में आती है और इसे स्टेराइल वाटर के साथ मिलाकर बच्चे को दिया जाता है। इसके बाद बच्चे को एक्स्ट्रा ब्रीदिंग सपोर्ट देने के लिए वेंटिलेटर पर रखा जाता है। सिंड्रोम की गंभीरता के आधार पर, डॉक्टर इस प्रक्रिया की फ्रीक्वेंसी और अवधि को तय करते हैं। यह थेरेपी सबसे अधिक प्रभावी तब होती है, जब जन्म के बाद शुरुआती 6 घंटों के दौरान इसे शुरू किया जाता है। 

ADVERTISEMENTS

2. ऑक्सीजन थेरेपी

इस थेरेपी में शिशु के अंगों में ऑक्सीजन दी जाती है। पर्याप्त ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जरूरी अंग ठीक तरह से काम नहीं कर पाते हैं और इसलिए शिशु को ऑक्सीजन देने के लिए वेंटिलेटर का इस्तेमाल किया जाता है। 

3. कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर ट्रीटमेंट

इस इलाज में एक कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर मशीन (एनसीपीएपी) के इस्तेमाल से नाक पर एक छोटे मास्क को रखकर नथुनों के द्वारा ऑक्सीजन दी जाती है। शिशु को अधिक इनवेसिव ट्रीटमेंट भी दी जा सकती है, जिसमें विंड पाइप में नीचे वेंटिलेटर रखा जाता है, जिससे बच्चे को ऑक्सीजन मिलती है। 

ADVERTISEMENTS

किसी जारी इलाज के दौरान शिशु को होने वाले किसी दर्द को कम करने के लिए, डॉक्टर दवाओं के इस्तेमाल का निर्णय भी ले सकते हैं। अपने डॉक्टर से परामर्श लेकर यह समझने की कोशिश करें, कि आपके बेबी के लिए कौन सा इलाज उचित होगा और उसे इस स्थिति से बाहर निकलने में कितना समय लगेगा। 

साथ ही जरूरी सावधानियों को भी समझने की कोशिश करें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके, कि बच्चे को यह बीमारी दोबारा परेशान नहीं करेगी। 

ADVERTISEMENTS

न्यूबॉर्न बच्चों में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम से बचाव

शिशुओं में रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम का सबसे प्रमुख कारण है, समय से पहले जन्म। नवजात शिशु में इस स्थिति से बचाव के लिए यह जरूरी है, कि उन सभी जरूरी बातों को ध्यान में रखा जाए, जिससे बच्चे का जन्म समय पर हो और समय से पहले न हो। 

पूरी प्रेगनेंसी के दौरान, लगातार उचित सावधानी बरतकर और अल्कोहल, अवैध ड्रग और सिगरेट के सेवन को बंद करके, प्रीमैच्योर डिलीवरी के खतरे को कम किया जा सकता है। 

ADVERTISEMENTS

जिन मामलों में प्रीमैच्योर डिलीवरी से बच पाना मुश्किल होता है, उनमें डॉक्टर, मां को कॉर्टिकोस्टेरॉइड दे सकते हैं। यह दवा फेफड़ों के तेज विकास और सर्फेक्टेंट के उत्पादन के लिए फायदेमंद है, जो कि नवजात शिशु के फेफड़ों की सही फंक्शनिंग के लिए बहुत आवश्यक है। 

पेरेंट्स के लिए नियोनेटल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम को मैनेज करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इस स्थिति में बच्चों को लगातार देखभाल और निरीक्षण की जरूरत होती है। जन्म के बाद अगले कुछ सालों के लिए, बच्चे के लिए जरूरी सावधानियों के बारे में अपने डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है। समय-समय पर बॉडी टेस्ट, आंखों की जांच, और सुनने की क्षमता की जांच के साथ-साथ, भविष्य में बच्चे को स्पीच थेरेपी की भी जरूरत हो सकती है। 

ADVERTISEMENTS

यह भी पढ़ें:

नियोनेटल सेप्सिस: कारण, लक्षण और इलाज
नियोनेटल हेपेटाइटिस: कारण, लक्षण और इलाज
ग्रे बेबी सिंड्रोम – कारण, लक्षण, इलाज और अन्य जानकारी

ADVERTISEMENTS

पूजा ठाकुर

Recent Posts

प्रिय शिक्षक पर निबंध (Essay On Favourite Teacher In Hindi)

शिक्षक हमारे जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वह केवल किताबों से ज्ञान नहीं…

2 months ago

मेरा देश पर निबंध (Essay On My Country For Classes 1, 2 And 3 In Hindi)

मेरा देश भारत बहुत सुंदर और प्यारा है। मेरे देश का इतिहास बहुत पुराना है…

2 months ago

शिक्षा का महत्व पर निबंध (Essay On The Importance Of Education In Hindi)

शिक्षा यानी ज्ञान अर्जित करने और दिमाग को सोचने व तर्क लगाकर समस्याओं को हल…

2 months ago

अच्छी आदतों पर निबंध (Essay On Good Habits in Hindi)

छोटे बच्चों के लिए निबंध लिखना एक बहुत उपयोगी काम है। इससे बच्चों में सोचने…

2 months ago

कक्षा 1 के बच्चों के लिए मेरा प्रिय मित्र पर निबंध (My Best Friend Essay For Class 1 in Hindi)

बच्चों के लिए निबंध लिखना बहुत उपयोगी होता है क्योंकि इससे वे अपने विचारों को…

2 months ago

मेरा प्रिय खेल पर निबंध (Essay On My Favourite Game In Hindi)

खेल हमारे जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं। ये न सिर्फ मनोरंजन का साधन…

2 months ago