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मानव ने विकास का एक लंबा सफर तय किया है। आज से 200 साल पहले जो मानव जीवन था वह आज 21वीं सदी में पुूरी तरह से बदल चुका है। 20वीं सदी और 21वीं सदी में तकनीक का जिस तरह से विकास हुआ है उसने मानव जीवन में अहम भूमिका अदा की है। विज्ञान की खोजों से कई हैरान कर देने वाले बदलाव हुए हैं, इसी के साथ कई क्षेत्रों में विकास भी तेजी से होता गया, मगर हर चीज के दो पहलू होते हैं। जहां तकनीक के विकास का हम इंसानों ने फायदा उठाया है तो इससे हमें कुछ नुकसान भी झेलने पड़ रहे हैं। इनमें से एक सबसे बड़ा खतरा बनकर सामने आया है ग्लोबल वार्मिंग के रूप में। विश्व भर के वैज्ञानिक काफी लंबे समय से ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन पर को लेकर चेतावनी दे रहे हैं क्योंकि यह हमारे जीवन पर सीधे तौर पर प्रभाव डालता है। बच्चों को भी जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभावों के बारे में जागरूक होने की आवश्यकता है क्योंकि निकट भविष्य में उनकी पीढ़ी इससे सबसे अधिक प्रभावित होगी।
ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के पीछे कुछ प्राकृतिक कारण और मनुष्य निर्मित कारण हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से लगातार धरती का तापमान बढ़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का सबसे बड़ा कारण ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है। लगातार जंगलों को खत्म किया जा रहा है और फॉसिल फ्यूल यानी जीवाश्म ईंधन को जलाया जा रहा है। इस वजह से धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। रिसर्च से सामने आया है कि साल 1901 से लेकर साल 2012 के बीच धरती का तापमान 0.89 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। आपको भले ही यह तापमान ज्यादा न लगे लेकिन यह बढ़ता तापमान धरती के मौसम और समुद्र की सतह पर बड़ा असर डाल सकता है और डाल भी रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि पिछले 100 सालों में धरती पर जो वर्ष सबसे गर्म हुए हैं वो 1995 के बाद के हैं। यह हमारी बढ़ती इंडस्ट्रियल एक्टिविटी और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण है।
ऐसी बहुत सी वजह हैं जिनसे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और ग्लोबल वार्मिंग का खतरा हमारे सामने आ खड़ा हुआ है:
पृथ्वी काफी समय से लेकर नेचुरल वार्मिंग और कूलिंग साइकिल के फेज से गुजर रही है और यह हजारों साल से ऐसे बनी हुई है। अभी, यह अपने प्राकृतिक वार्मिंग चक्र में से एक के बीच में है। दुर्भाग्य से, बीते कुछ समय और वर्तमान में जारी मानव गतिविधि ने केवल वार्मिंग प्रक्रिया को तेज ही किया है।
आप मानें या न मानें लेकिन अगर आप अगली बार हेयर स्प्रे या रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल करते हैं तो आप ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को बढ़ावा दे रहे हैं। पहले इनमें ऐसे ओजोन रिड्यूसिंग कंपाउंड मिले होते थे, जो धरती के सुरक्षा कवच के रूप में जानी जाने वाली ओजोन की परत को कम करते थे। अब इनमें ऐसे तत्वों का इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है लेकिन अभी भी इनमें ऐसे हानिकारक केमिकल उपयोग होते हैं जो ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को बढ़ाते हैं।
ग्रीनहाउस गैसों और ग्लोबल वार्मिंग के खतरों के सबसे बड़े कारणों में से एक है जीवाश्म ईंधन यानी फॉसिल फ्यूल। हम इस पर काफी निर्भर भी हैं। करोड़ों साल पहले मरे हुए जीवों और पेड़-पौधों से जीवाश्म ईंधन बनता है। औद्योगिक जगत जीवाश्म ईंधन पर बहुत निर्भर होता है। जीवाश्म ईंधन के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड पैदा होती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है। इस वजह से जीवाश्म ईंधन ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को बढ़ाने में काफी योगदान देता है।
जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है उसी हिसाब से जरूरतें भी बढ़ रही है। घरेलू और औद्योगिक मांगों को पूरा करने के लिए लगातार जंगलों-पेड़ों को काटा जा रहा है। पेड़ों की हद से ज्यादा कटाई पर्यावरण के लिए भी बेहद नुकसानदायक है। जंगलों और पेड़ों की कटाई से कार्बन डाइऑक्साइड में काफी इजाफा होता है जिससे धरती का तापमान भी बढ़ता है।
ग्लोबल वार्मिंग धरती की हर एक चीज को पूरी तरह से प्रभावित करती है। यह हमारे मौसम और पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव डालती है। ग्लोबल वार्मिंग के कुछ प्रभाव इस प्रकार हैं-
मौसम वैसे तो महासागरों, वातावरण, लैंड मास में मौजूद गर्मी आदि से संचालित होता है लेकिन ग्लोबल वार्मिंग से पूरी दूनिया के मौसम पैटर्न में भी भारी बदलाव का आना शुरू हो चुका है। ग्रीनहाउस गैसों और बढ़ते तापमान की वजह से मौसम के पैटर्न में भी भारी बदलाव आ रहा है। कभी भी तूफान का आना, बिना मौसम के बारिश हो जाना या लंबे समय तक सूखा पड़ना इसमें शामिल हैं।
क्लाइमेट चेंज से जानवरों के जीवन से लेकर हमारा पर्यावरण भी प्रभावित हुआ है। इसके असर से कई जानवरों के आवास का नुकसान हुआ है। जो जानवर रेगिस्तान, वर्षा वनों या ध्रुवीय इलाकों में रहते हैं उन्हें क्लाइमेट चेंज से काफी संकटों का सामना करना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन उनके प्रवासी रास्तों से लेकर उनके भोजन तक पर विनाशकारी असर डाल रहा है। हाल ऐसा हो गया है कि आज कई जानवर लुप्त होने की कगार पर पहुँच चुके हैं।
मानवी गतिविधियों के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का अधिक मात्रा में रिलीज होना और सागर, नदी और झीलों में घुल जाना कई बायोलॉजिकल प्रक्रिया के तहत एसिडिफिकेशन प्रभाव को बढ़ाता है जिससे समुद्र में रहने वाले जीवों के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है।
बर्फ के पहाड़ों पर ज्यादातर ताजा पानी जमा होता है। जब ये बर्फ पिघलती है तो इनका ताजा पानी समुद्र में भारी मात्रा में चला जाता है जो समुद्र को प्रभावित करता है। इससे समुद्री जीवन से लेकर समुद्री लहरों तक में परिवर्तन होता है। सैटेलाइट से मिली तस्वीरों में ये देखा गया है कि ग्रीनलैंड आइस शेल्फ 2002 से 2006 के बीच में अब तक लगभग 250 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ खो चुका है। वहीं अंटार्कटिका में 2002 से 2005 के बीच 152 क्यूबिक किलोमीटर बर्फ खत्म हो चुकी है।
जिस तेजी के साथ चोटियों से बर्फ पिघल रही है और उसका पानी समुद्र में जमा हो रहा है, उस हिसाब से अगले कुछ सालों में समुद्र का जलस्तर कई फुट बढ़ सकता है। इसका असर भी देखने को मिल रहा है। समुद्र के किनारे बसे शहरों में लगातार बाढ़ आ रही है जिससे हजारों-लाखों लोगों को अपनी जगह और घर छोड़ना पड़ रहा है।
ग्रीन हाउस गैस का उत्पादन कम करके जलवायु परिवर्तन को काफी कम किया जा सकता है। बच्चों के लिए ग्लोबल वार्मिंग को कैसे रोका जा सकता है, इसके लिए नीचे कुछ सुझाव दिए गए हैं –
यहाँ हम बच्चों के लिए ग्लोबल वार्मिंग से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी दे रहे हैं, जिससे बच्चों को ये याद रहे –
क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन का अर्थ मौसम की उस संरचना से है जो किसी एक खास क्षेत्र में दशकों तक अनुभव की जाती है। इसमें उस क्षेत्र की बारिश, गर्मी, सर्दी, धूप और सूखे जैसी मौसम शामिल होते हैं। क्लाइमेट चेंज नया नहीं है। यह मौसम परिवर्तन है जो सदियों से होता आ रहा है। आप में से ज्यादातर लोग हिमयुग या आइस एज शब्द से परिचित होंगे। यह काल पृथ्वी को ठंडा रखने का समय था। अभी हम जिस जलवायु परिवर्तन के बारे में चिंता कर रहे हैं वह धरती का तेजी से गर्म होना है। यह मानव की गतिविधियों की वजह से हो रहा है।
मौसम और जलवायु, धरती को सूर्य से मिलने वाली गर्मी से प्रभावित होते हैं। जो गर्मी, भूमि, समुद्र और वातावरण द्वारा अब्सॉर्ब होती है। इन तीनों के बीच गर्मी का आदान-प्रदान, हवा, नमी और समुद्री धाराओं का कारण बनता है जो मौसम को संचालित करता है। मौसम का मिजाज अचानक काफी बदल सकता है। जैसे-जैसे वातारवण में ग्रीनहाउस गैसे बढ़ती हैं वैसे वैसे धरती का तापमान भी बढ़ने लगता है। इस वजह से धरती के मौसम में भी काफी परिवर्तन आ जाता है। अल-नीनो और ला-नीना जैसे मौसम पैटर्न में ऐसे बदलाव पहले से ही देखे जा रहे हैं जो कई क्षेत्रों पर एक ही समय में ज्यादा बारिश या सूखे की समस्या का कारण बन रहे हैं। यह अनुमान लगाया जाता है कि ऑटोमोबाइल, उद्योगों और अन्य मानवीय गतिविधियों द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण वातावरण में अधिक गर्मी बनी रहती है।
बच्चों को क्लाइमेट चेंज के बारे में जरूर बताना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि हमारे पर्यावरण पर जलवायु परिवर्तन का क्या प्रभाव पड़ता है। बच्चों को समझाना अहम है कि हमारा भविष्य, हमारे पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। पृथ्वी के मौसम के पैटर्न में किसी भी तरह का परिवर्तन जब आता है तब उसका असर जानवरों और जंगलों पर भी पड़ता है। उदाहरण के तौर पर कम बारिश होने पर सूखा पड़ सकता है या अधिक गर्मी पड़ सकती है। जिसका असर जानवरों पर पड़ सकता है। ज्यादा गर्मी होने पर पेड़ों के विकास में परेशानी हो सकती है जिससे जानवरों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। कई पक्षियों, कीड़ों और जानवरों का दूसरे इलाकों और देशों में प्रवास मौसम और मौसम के बदलाव पर निर्भर करता है। जलवायु परिवर्तन से यह चक्र, उनके प्राकृतिक घरों, प्रवासी और संभोग व्यवहार को बदलकर उनको नुकसान और परेशानी पहुँचा सकता है। रिसर्च कहती हैं कि कुछ पक्षियों के लगभग 50 प्रतिशत प्रजनन आवास खत्म हो सकते हैं। गर्म महासागर जो एसिडिक होते हैं, वे कोरल रीफ्स और विशाल समुद्री जीवन को भी मार सकते हैं। कहा जाता है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन धरती से 30 से 40 प्रतिशत तक प्रजातियों का सफाया कर सकता है।
जलवायु परिवर्तन से मानव जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। अल-नीनो के लंबे समय तक चलने से दुनिया के एक हिस्से में भयंकर सूखा पड़ सकता है और दूसरी तरफ भयंकर तूफान और बाढ़ आ सकती है। विकासशील देश, जो मुख्य रूप से मानसून जैसे मौसमी बारिश पर निर्भर होते हैं, वर्षा में बदलाव से प्रभावित होंगे। गर्म तापमान बीमारियों को तेजी से फैलाएगा और पानी के स्तर में बढ़ोतरी के कारण 10-20 करोड़ लोग बेघर हो जाएंगे।
इन बातों की जानकारी बच्चों को देकर उन्हें ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के बारे में बताया जा सकता है-
ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए हम जो भी कदम उठाते हैं, वह बहुत छोटे हैं। लेकिन हम अपने प्रयासों से ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार को कम कर सकते हैं या उसे रोक सकते हैं।
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