बड़े बच्चे (5-8 वर्ष)

भारत में बच्चा गोद लेना – प्रक्रिया, नियम और कानून

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भारत और पूरी दुनिया में आज बच्चा गोद लेना एक आम बात बन चुकी है। अक्सर लोग दत्तक ग्रहण यानी बच्चा गोद इसलिए लेते हैं क्योंकि या तो वे बच्चे को जन्म देने में असमर्थ होते हैं या फिर इसलिए कि वे उस अनाथ बच्चे को नया जीवन व सहारा देना चाहते हैं जो दुनिया में अकेला है। भारतीय समाज पहले दत्तक ग्रहण को लेकर बहुत खुले विचारों वाला नहीं था किंतु अब इस विषय पर लोगों के विचार और धारणाएं बदल गई हैं। 

अन्य देशों की तरह ही भारत में भी बच्चा गोद लेने के संबंध में कई नियम व कानून बनाए गए हैं।

भारत में बच्चा गोद लेने के लिए योग्यता

भारत में, गोद लेने की प्रक्रिया की निगरानी केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (सी.ए.आर.ए.) द्वारा की जाती है, जो देश के अंदर में और विदेशों में गोद लेने की प्रक्रिया की निगरानी और विनियमन करने के लिए नोडल संस्था है और यह महिला और बाल कल्याण मंत्रालय का एक हिस्सा है। दत्तक ग्रहण के योग्य होने के लिए गोद लेने वाले माता-पिता द्वारा निम्नलिखित मूल शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:

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  • भारत में भारतीय नागरिक, एनआरआई (नॉन रेजीडेंट इंडियन) या एक विदेशी नागरिक द्वारा किसी बच्चे को गोद लिया जा सकता है। गोद लेने की प्रक्रिया तीनों के लिए अलग-अलग होती है।
  • कोई भी व्यक्ति किसी भी लिंग या कैसी भी वैवाहिक स्थिति के बावजूद बच्चा गोद लेने के लिए पात्र होता है।
  • यदि कोई दंपति बच्चा गोद ले रही है, तो उनकी कम से कम दो साल की स्थिर शादी होनी चाहिए और बच्चे को गोद लेने के लिए दोनों की संयुक्त सहमति भी होनी चाहिए।
  • बच्चे और भावी माता-पिता की आयु में 25 वर्ष से कम अंतर नहीं होना चाहिए।

बच्चे को गोद कब लिया जा सकता है

  • भारतीय केंद्र सरकार के निर्देशानुसार किसी भी अनाथ, त्यागे हुए बच्चे को या बाल कल्याण समिति द्वारा ‘कानूनी रूप से मुक्त’ घोषित किए हुए बच्चे को गोद लिया जा सकता है।
  • एक बच्चे को अनाथ तब कहा जाता है जब कानूनी रूप से बच्चे के माता-पिता या अभिभावक न हों या माता-पिता बच्चे की देखभाल करने में सक्षम न हों।
  • एक बच्चे को छोड़ा हुआ तब माना जाता है जब बाल कल्याण समिति द्वारा यह घोषित कर दिया गया हो कि बच्चे को माता-पिता द्वारा त्याग दिया गया है।
  • एक बच्चे को परित्यक्त या त्यागा हुआ तब माना जाता है जब बाल कल्याण समिति ने यह घोषित कर दिया हो कि बच्चे को ऐसे शारीरिक, सामाजिक और भावनात्मक कारकों के आधार पर त्याग दिया गया है जो माता-पिता या अभिभावक के नियंत्रण से बाहर हैं।
  • एक बच्चे को तभी गोद लिया जा सकता है जब वह कानूनी रूप से मुक्त हो। एक परित्यक्त या त्यागे हुए बच्चे के मिलने पर, जिला बाल संरक्षण यूनिट राज्य के व्यापक समाचार पत्रों में बच्चे की तस्वीर और विवरण के साथ अलर्ट जारी करती है और स्थानीय पुलिस से उसके माता-पिता का पता लगाने का अनुरोध करती है। बच्चे को गोद लेने के लिए कानूनी रूप से तब स्वतंत्र माना जाता है, जब पुलिस यह रिपोर्ट दे देती है कि बच्चे के माता-पिता का पता नहीं लगाया जा सका है।

माता-पिता के लिए सामान्य शर्तें

सी.ए.आर.ए. ने बच्चे को गोद लेने में सक्षम होने के लिए भावी दत्तक माता-पिता के लिए योग्यता के मानदंड को परिभाषित किया है, वे मानदंड इस प्रकार हैं;

  • भावी दत्तक माता-पिता शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से स्थिर व स्वस्थ होने चाहिए।
  • वे आर्थिक रूप से बच्चे को संभालने में सक्षम होने चाहिए।
  • भावी माता-पिता को किसी भी प्रकार के गंभीर या जीवन-घातक रोग नहीं होने चाहिए।
  • विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के मामलों को छोड़कर तीन या अधिक बच्चों वाले माता पिता को गोद लेने के लिए योग्य नहीं माना जाता है।
  • एक अकेली महिला किसी भी लिंग के बच्चे को गोद ले सकती है। हालांकि, एक अकेला पुरुष बेटी गोद लेने के लिए योग्य नहीं है।
  • एकल अभिभावक की आयु 55 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • एक दंपति की संयुक्त आयु 110 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • बच्चा गोद लेने की योग्यता प्राप्त करने के लिए पंजीकरण की तिथि के दिन भावी माता-पिता की आयु सी.ए.आर.ए. के निर्देशानुसार ही होनी चाहिए।

भारत में बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया

भारत में एक बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया में कई नियम व कानून हैं जिसकी देख-रेख केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण द्वारा की जाती है।

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भारत में बच्चे को गोद लेने की प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है:

चरण 1 – पंजीकरण

सबसे पहले भावी दत्तक माता-पिता को एक अधिकृत एजेंसी में पंजीकरण कराने की आवश्यकता होती है। मान्यता प्राप्त भारतीय नियोजन संस्थाएं (आर.आई.पी.ए.) और विशेष दत्तक ग्रहण संस्था (एस.पी.ए.) ऐसी संस्थाएं हैं जिन्हें भारत में इस प्रकार के पंजीकरण करने की अनुमति है। भावी दत्तक माता-पिता अपने क्षेत्र में दत्तक समन्वय संस्था को देखने के लिए जा सकते हैं जहाँ सामाजिक कार्यकर्ता इसकी पूर्ण प्रक्रिया के बारे में बताते हैं और आपको पंजीकरण के लिए आवश्यक औपचारिकताओं, कागजी कार्रवाई और सामान्य तैयारी के बारे में जानकारी देते हैं।

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चरण 2 – गृह अध्ययन और परामर्श

पंजीकरण संस्था का एक सामाजिक कार्यकर्ता घर की स्थिति जानने के लिए भावी दत्तक माता-पिता के घर का दौरा करता है। संभावित माता-पिता के कारण, तैयारी, सक्षमता और कमजोरियों को समझने के लिए संस्था को माता-पिता के साथ परामर्श सत्र की आवश्यकता हो सकती है। सी.ए.आर.ए. विनियमन के अनुसार, गृह अध्ययन को पंजीकरण की तारीख से 3 महीने के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।

गृह अध्ययन और परामर्श सत्र के निष्कर्ष को माननीय अदालत में सूचित किया जाता है।

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चरण 3 – बच्चे की जानकारी देना

जब कोई बच्चा दत्तक ग्रहण के लिए उपलब्ध होता है तो संस्था इच्छुक दंपति को इसकी सूचना देती है। संस्था द्वारा बच्चे की स्वास्थ्य रिपोर्ट, शारीरिक परीक्षण रिपोर्ट और अन्य प्रासंगिक जानकारी भावी दंपति को दी जाती है और दिए हुए विवरण के साथ सहज होने पर उन्हें बच्चे के साथ समय बिताने की अनुमति भी दी जाती है।

चरण 4 – बच्चे की स्वीकृति

यदि भावी दंपति बच्चे से मिलकर सहज महसूस करते हैं तो उन्हें बच्चे की स्वीकृति से संबंधित कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता होती है।

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चरण 5 – याचिका दायर करना

सभी आवश्यक दस्तावेज एक वकील को दिखाए जाते हैं जिसके बाद वकील इन दस्तावेजों को अदालत में प्रस्तुत करने के लिए अपील तैयार करता है। दरख्वास्त तैयार हो जाने के बाद, दत्तक माता-पिता को अदालत जाकर अधिकारी के सामने इस दरख्वास्त पर हस्ताक्षर करना होगा।

चरण 6 – गोद लेने से पूर्व देखभाल

कानूनी कार्यवाही होने के बाद दत्तक माता-पिता बच्चे को गोद लेने से पूर्व देखभाल केंद्र में ले जा सकते हैं और घर ले जाने से पहले नर्सिंग स्टाफ से बच्चे की आदतों के बारे में अच्छी तरह से जान सकते हैं।

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चरण 7 – कोर्ट की सुनवाई

बच्चे को माता पिता के साथ कोर्ट की सुनवाई के लिए जाना होता है, यह सुनवाई न्यायधीश के साथ बंद कमरे में होती है। इस दौरान न्यायाधीश कुछ सवाल पूछ सकते हैं और उस धनराशि का उल्लेख कर सकते हैं जिसे बच्चे के नाम पर निवेश करने की आवश्यकता है।

चरण 8 – कोर्ट का आदेश

बच्चे के नाम पर उल्लेखित धनराशि निवेश करने के बाद न्यायधीश बच्चे को गोद लेने की अनुमति देते हैं। 

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चरण 9 – फॉलो अप

गोद लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद संस्था बच्चे की फॉलो अप रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत करती है, यह कार्यवाही लगभग 1-2 वर्ष तक चलती है। 

क्या माता-पिता एक विशिष्ट बच्चे को गोद ले सकते हैं?

भावी माता-पिता एक विशिष्ट बच्चे को गोद नहीं ले सकते हैं।यदि आप केवल नवजात शिशु गोद लेने की तलाश कर रहे हैं तो यह पूरी तरह से संभव नहीं हो सकता है। हालांकि, भावी माता-पिता निम्नलिखित प्राथमिकताएं दे सकते हैं, जैसे;

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  • आयु
  • बच्चे का लिंग
  • त्वचा का रंग
  • स्वास्थ्य स्थिति (माता-पिता निर्दिष्ट कर सकते हैं कि क्या वे शारीरिक या मानसिक विकलांगता वाले बच्चे को गोद लेना चाहते हैं)
  • धर्म

प्राथमिकताओं के आधार पर अपने अनुकूल बच्चे को गोद लेने में अधिक समय लग सकता है। इन मामलों में प्राथमिकताओं के कारण गोद लेने के लिए उपलब्ध बच्चों की संख्या कम हो जाती है।

भारत में बच्चा गोद लेने के कानून

भारत में दत्तक कानून व्यक्तिगत धर्म के निजी कानूनों के साथ संयोजित है और इसलिए, देश में मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों और यहूदियों के व्यक्तिगत कानूनों के अनुसार गोद लेने की अनुमति नहीं है। हालांकि, अदालत के अनुमोदन के अधीन अभिभावक और वार्ड अधिनियम, 1890 के तहत अनाथालय से बच्चा गोद लिया जा सकता है। इस मामले में, दत्तक दंपति अभिभावक हैं और गोद लिए गए बालक के माता-पिता नहीं हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत, ईसाई केवल पालक देखभाल के तहत एक बच्चे को गोद ले सकते हैं और पालक बच्चा विपरीत स्थिति में अभिभावकों से सभी संबंधों को तोड़ने के लिए स्वतंत्र है।

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भारतीय नागरिक जो हिंदू, जैन, बौद्ध या सिख हैं उन्हें औपचारिक रूप से एक बच्चा गोद लेने की अनुमति है और गोद लेने की प्रक्रिया हिंदू दत्तक और रख-रखाव अधिनियम, 1956 के अनुसार होती है जिसे हिंदू कोड बिल के हिस्से के रूप में लागू किया गया था।

त्यागे हुए बच्चे, परित्यक्त बच्चे या जिन बच्चों के साथ दुर्व्यवहार किया गया है, उन्हें गोद लेने की प्रक्रिया को जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

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वर्तमान में, कोई विशिष्ट कानून नहीं है जो विदेशी नागरिकों या एनआरआई द्वारा भारत में बच्चों को गोद लेने को नियंत्रित करता है, लेकिन इसे बच्चों को गोद लेने के दिशानिर्देश, 2015 के तहत शासित किया जाता है। ठोस अंतर्देशीय दत्तक अधिनियम की अनुपस्थिति में, संरक्षक और वार्ड अधिनियम, 1890 द्वारा निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है।

बच्चा गोद लेने के लिए आवश्यक दस्तावेज

गोद लेने की प्रक्रिया के लिए तैयार किए जाने वाले दस्तावेजों की सूची निम्नलिखित है:

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  • दत्तक आवेदन पत्र
  • 4 x 6 इंच आकार की फोटो – पति और पत्नी की एक साथ फोटो की 4 प्रतियां
  • विवाह प्रमाण पत्र और आयु का प्रमाण
  • गोद लेने का कारण
  • दंपति की नवीनतम एच.आई.वी. और हेपेटाइटिस ‘बी’ की मेडिकल रिपोर्ट
  • आय प्रमाण पत्र
  • निवास प्रमाण पत्र
  • निवेश का विवरण
  • 2 व्यक्तियों का संदर्भ पत्र
  • कोई अन्य दस्तावेज जो संस्था या न्यायालय द्वारा आवश्यक हो

स्रोत: आवश्यक दस्तावेज – सी.ए.आर.ए.

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या भारत में गोद लेने की प्रक्रिया एक राज्य से दूसरे राज्य में अलग है?

गोद लेने का कानून पूरे भारत में एकसमान है, कुछ निश्चित निर्देश और कागजी कार्रवाई की आवश्यकता होती है जो प्रत्येक राज्य के लिए भिन्न हो सकती है।

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2. क्या बच्चे को गोद लेने के लिए न्यूनतम आय की जरूरत है?

सी.ए.आर.ए. के अनुसार, एक बच्चे को अपनाने में सक्षम होने के लिए आपकी न्यूनतम औसत आय रु 3000 होनी चाहिए। यदि, आपके पास घर या कोई मजबूत आर्थिक बल जैसी संपत्ति है, तो आपकी कम आय के बावजूद आपके आवेदन पर विचार किया जा सकता है।

3. यदि पहले से ही मेरा एक बच्चा है तो क्या मैं एक और बच्चा गोद ले सकता/सकती हूँ?

हाँ, आप एक और बच्चा गोद ले सकते हैं। हालांकि, हिंदू दत्तक और रख-रखाव अधिनियम के तहत आप केवल अपने बच्चे के विपरीत लिंग के बच्चे को गोद ले सकते हैं। अभिभावक और वार्ड अधिनियम के तहत और किशोर न्याय अधिनियम में ऐसा कोई आदेश नहीं है। आप जिस बच्चे को गोद ले रहे हैं यदि वह इस मामले पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए पर्याप्त रूप से समझदार है, तो उसकी सलाह लिखित में ली जाएगी।

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4. बच्चा गोद लेने के लिए आवेदन के बारे में कहाँ पता लगाया जा सकता है?

हालांकि, आवेदन के बारे में जानने के लिए केंद्रीय डेटाबेस नहीं है, आप इसके बारे में पूरी जानकारी लेने के लिए ए.सी.ए. (एसोसिएशन ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट) के संपर्क में रह सकते हैं।

5. गोद लेने के दौरान बच्चे की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी कैसे ली जा सकती है?

बच्चे के स्वास्थ्य संबंधी संपूर्ण जानकारी लेने के लिए आपको उसका शारीरिक परीक्षण करवाने का अधिकार होता है। हालांकि, विशेष परीक्षण केवल तभी किया जाना चाहिए जब कोई गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो।

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श्रेयसी चाफेकर

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