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जब आपका बेबी दूध पीने में सक्षम नहीं होता है, तब उसे लैक्टोज इनटॉलेरेंस कहते हैं। इस समस्या में कभी-कभी बच्चों को रैशेज हो सकते हैं और वे बेहोश भी हो सकते हैं। दूध कैल्शियम, विटामिन ‘डी’ और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो कि बच्चे के विकास और सही स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। इस लेख में हम आपको लैक्टोज इनटॉलेरेंस के बारे में बता रहे हैं और साथ ही अपने बच्चे की मदद के तरीके भी हम आपको बताएंगे।
दूध में मौजूद लैक्टोज (शक्कर) को डाइजेस्ट कर पाने में अक्षमता को लैक्टोज इनटॉलेरेंस कहते हैं। जब कोई बच्चा लैक्टोज इनटॉलेरेंट होता है, तब उसका डाइजेस्टिव सिस्टम लैक्टेज नामक एंजाइम की उत्पत्ति में नाकाम होता है, जो कि दूध को पचाने के लिए जिम्मेदार होता है। शिशुओं में लैक्टोज इनटॉलेरेंस दुर्लभ है और आमतौर पर ठोस आहार की शुरुआत से पहले, 2 साल की उम्र तक इसका पता नहीं चलता है। हालांकि कुछ बच्चों में जन्म से ही लैक्टोज इनटॉलेरेंस की समस्या होती है, जिसका मतलब है, कि वे मां का दूध भी नहीं पी पाते हैं और इसके बजाय उन्हें विशेष रूप से बनाए गए लैक्टोज फ्री दूध की जरूरत होती है।
यूके में हर 50 बच्चों में से केवल 1 बच्चे में यह स्थिति दिखती है। वहीं, एशियाई देशों और अफ्रीकन व कैरेबियन देशों में रहने वाले लोगों में यह अधिक देखा जाता है। जिन लोगों को क्रोन्स डिजीज और सिलियक डिजीज जैसी समस्याएं होती हैं, वे आमतौर पर लैक्टोज इनटॉलेरेंट होते हैं और उनके भोजन में अन्य चीजों के साथ-साथ डेयरी प्रोडक्ट की भी मनाही होती है।
बच्चों में मुख्य रूप से तीन तरह के लैक्टोज इनटॉलेरेंस देखे जाते हैं, जो कि नीचे दिए गए हैं:
वंशानुगत लैक्टोज इनटॉलेरेंस अनुवांशिकता से जुड़ा हुआ है और परिवार में यह चलता रहता है। इस स्थिति में आपके बच्चे में लैक्टेज एंजाइम की कमी होती है और वह जन्म से ही दूध और अन्य डेयरी प्रोडक्ट के प्रति असहिष्णु होता है।
जब दूध और चीज जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स के सेवन में कमी के कारण आंतों में लैक्टेज का उत्पादन घट जाता है, तब प्राइमरी लैक्टोज इनटॉलेरेंस होता है। आमतौर पर यह वयस्कों में देखा जाता है और बच्चों में इसका अनुभव बहुत ही दुर्लभ है। इसे टेंपरेरी लैक्टोज इनटॉलेरेंस के नाम से भी जाना जाता है।
अगर पेट या आंतों में क्रोन्स डिजीज, सिलियक डिजीज जैसी कोई छुपी हुई स्वास्थ्य समस्या होती है या लैक्टेज एंजाइम के उत्पादन में रुकावट डालने वाला कोई इंफेक्शन होता है, तो इसके कारण सेकेंडरी लैक्टोज इनटॉलेरेंस हो जाता है।
बच्चे को लैक्टोज इनटॉलेरेंस की जांच के लिए डॉक्टर के पास ले जाकर इसका पता लगाया जा सकता है। डॉक्टर आपकी मेडिकल हिस्ट्री, खानपान और फैमिली हिस्ट्री की जांच करेंगे और बच्चे की जांच करके इसका पता लगाएंगे। अगर बच्चे में लैक्टोज इनटॉलेरेंस पाया जाता है, तो कुछ सप्ताह के लिए बच्चे को लैक्टोज रहित दूध पिलाकर यह देखने की कोशिश की जाती है, कि उसके लक्षण जाते हैं या नहीं। अगर इसके लक्षण चले जाते हैं, तो आपको बच्चे को लैक्टोज फ्री खानपान जारी रखने की सलाह दी जाती है या फिर उसके लिए लैक्टोज के अन्य विकल्पों के बारे में विचार किया जाता है।
स्तनपान करने वाले बच्चों में लैक्टोज इनटॉलेरेंस को लेकर लोकप्रिय मत के विपरीत, मां के डेयरी प्रोडक्ट के सेवन बंद करने के बाद भी, उनमें इसके लक्षण दिखने बंद नहीं होते हैं। क्योंकि लैक्टेज (दूध में मौजूद शक्कर) केवल इंसानों या अन्य पशुओं के बजाय सभी स्तनधारियों के दूध में पाया जाता है। प्राइमरी लैक्टोज इनटॉलेरेंस से ग्रस्त स्तनपान करने वाले बच्चे को, इनटॉलेरेंस के लक्षणों से होने वाले गंभीर डिहाइड्रेशन या कॉम्प्लीकेशन्स के कारण विशेष डाइट पर रखा जाएगा। अन्य प्रकार के लैक्टोज इनटॉलेरेंस के लिए बच्चे को ब्रेस्ट मिल्क देना जारी रखा जाता है और किसी तरह की छिपी हुई स्थिति की हीलिंग और निगरानी के लिए रूटीन चेकअप के लिए पेडिअट्रिशन के पास लेकर जाया जाता है।
छोटे बच्चों में लैक्टोज इनटॉलेरेंस के कुछ कारण इस प्रकार हैं:
शिशुओं में लैक्टोज इनटॉलेरेंस के कुछ संकेत और लक्षण इस प्रकार हैं:
रैशेज और अत्यधिक उल्टियां केवल लैक्टोज इनटॉलेरेंस ही नहीं, बल्कि दूध के प्रति एलर्जी का संकेत भी हो सकते हैं। अगर ऐसा हो, तब आपके बच्चे का इम्यून सिस्टम, दूध में मौजूद शक्कर के बजाय प्रोटीन के प्रति रिएक्ट कर रहा होता है। सुरक्षा के लिए अपने बच्चे को पूरे क्लिनिकल एग्जामिनेशन के लिए डॉक्टर के पास लेकर जाएं। शेडर, फेटा और मोजेरेला चीज जैसे कुछ चीज में डेयरी प्रोडक्ट के दूसरे स्रोतों की तुलना में लैक्टोज कम मात्रा में पाया जाता है।
आपके पेडिअट्रिशन सबसे पहले आपके बच्चे की मेडिकल रिपोर्ट, परिवार के इतिहास और न्यूट्रिशन चार्ट को देखेंगे, ताकि शिशु में लैक्टोज इनटॉलेरेंस को सही तरह से समझा जा सके। शुरुआती रिव्यू के बाद डॉक्टर निम्नलिखित जांच की सलाह दे सकते हैं:
इससे दूध पीने के पहले और बाद, बच्चे में हाइड्रोजन के स्तर को मापा जाता है। डेयरी प्रोडक्ट्स के सेवन के बाद आमतौर पर थोड़ी मात्रा में हाइड्रोजन की मौजूदगी होती है, लेकिन अगर यह स्तर असामान्य हो, तो जांच के नतीजे पॉजिटिव होते हैं, जो कि लैक्टोज इनटॉलेरेंस को दर्शाते हैं।
एसिडिटी के स्तर की जांच के लिए, बच्चे की पॉटी का सैंपल लिया जाता है। जिन बच्चों को लैक्टोज इनटॉलेरेंस की समस्या होती है, उनका मल एसिडिक होता है। एक अन्य टेस्ट में मल में मौजूद ग्लूकोज की मात्रा की जांच की जाती है और उसे यह पता चलता है, कि लैक्टोज डाइजेस्ट हो रहा है या नहीं।
एंडोस्कोपी एक तरह की बायोप्सी होती है, जिसमें उपकरण बच्चे की आंतों को करीब से देख सकता है और उसमें लैक्टेज के स्तर की जांच के लिए उसका इस्तेमाल किया जाता है। अगर पेडिअट्रिशन इसकी सलाह देते हैं, तो आपको बच्चे को लेकर एक गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट के पास जाना पड़ सकता है।
बच्चों में लैक्टोज इनटॉलेरेंस के इलाज में 2 सप्ताह के लिए उनके भोजन में से लैक्टोज को हटाने और लक्षणों के खत्म होने के बाद धीरे-धीरे दोबारा शामिल करना शामिल है।
वैसे तो अपने बच्चे को लैक्टोज इनटॉलेरेंस से बचाने के लिए आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकती हैं। लेकिन फिर भी यहां ऐसी कुछ चीजें दी गई हैं, जिनसे आप अपने बच्चे की मदद कर सकती हैं:
अगर आपके बच्चे को टेंपरेरी लैक्टोज इनटॉलेरेंस है, तो उसे ब्रेस्टफीड कराना बंद न करें। चूंकि यह तात्कालिक है, तो आपको निश्चिंत रहना चाहिए, कि समय के साथ उसकी स्थिति में सुधार हो जाएगा। अगर आपके बच्चे में स्थाई लैक्टोज इनटॉलेरेंस है, तो आप उसे सोया दूध या अन्य प्लांट बेस्ड दूध दे सकते हैं।
आपके बच्चे में इसके लक्षण दिखने पर, लैक्टोज इनटॉलेरेंस को बढ़ावा देने वाले डेयरी प्रोडक्ट्स पर नजर रखें और उसके भोजन में शामिल खाद्य पदार्थों का ध्यान रखें। एक फूड लॉग रखने से पेडिअट्रिशन को यह पता लगाने में मदद मिलेगी, कि विशेष रूप से कौन से खाद्य पदार्थ बच्चे के लक्षणों को बढ़ाते हैं और कौन से नहीं। उदाहरण के लिए, दही को पचाना दूध को पचाने से अधिक कठिन होता है, क्योंकि आसान पाचन के लिए इसे लैक्टिक एसिड में फर्मेंट नहीं किया जाता है।
अगर बच्चे को स्थाई लैक्टोज इनटॉलेरेंस है और पेडिअट्रिशन उसके भोजन में से सभी डेयरी प्रोडक्ट्स को निकालने की सलाह देते हैं, तो आपको कैल्शियम के दूसरे स्रोतों को ढूंढने की जरूरत पड़ेगी। मजबूत और स्वस्थ हड्डियों के लिए कैल्शियम जरूरी होता है और इसकी कमी होने से रिकेट्स या हड्डियों की दूसरी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ बेहतरीन प्लांट बेस्ड कैल्शियम के स्रोतों में केल (करम साग) और पालक जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां, बींस, संतरे और अंजीर जैसे फल, बादाम और ब्राजील नट्स जैसे नट्स, सोया मिल्क, तिल और सालमन जैसी मछलियां शामिल हैं।
कैल्शियम के अलावा आपको विटामिन ‘डी’, राइबोफ्लेविन, फास्फोरस और विटामिन ‘ए’ पर भी नजर रखने की जरूरत है। विटामिन ‘डी’ आपको रागी या लिक्विड ड्रॉप सप्लीमेंट या डिब्बाबंद टूना और सीरियल जैसे फोर्टिफाइड फूड आदि से मिल सकता है।
अगर डॉक्टर बच्चे को लो लैक्टोज डाइट देने की सलाह देते हैं, तो आप अपने बेबी को बटर और मार्जरिन भी दे सकती हैं। अगर उसके भोजन में से लैक्टोज को पूरी तरह से हटाने के लिए कहा गया है, तो फिर आपको सोया मिल्क जैसे लेक्टोज फ्री दूध का इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि उसके लक्षणों में सुधार हो और बच्चे की स्थिति खराब होने से बच सके।
जब लैक्टोज इनटॉलेरेंस से निपटने की बात आती है, तो इस स्थिति के अनुसार व्यवहार करना पड़ता है और इसे याद रखना बहुत जरूरी है। कभी-कभी यह केवल तब तक ही होता है, जब तक बच्चे का पाचन तंत्र एंजाइम के उत्पादन को बढ़ाने में सक्षम नहीं हो जाता जबकि कई बार दूसरे मामलों में आप इतने भाग्यशाली नहीं होते हैं। लेकिन जिन बच्चों में स्थाई लैक्टोज इनटॉलेरेंस है, उनके लिए अभी भी थोड़ी उम्मीद है, क्योंकि ऐसे कई प्लांट बेस्ड स्रोत हैं, जिनसे कैल्शियम और विटामिन ‘डी’ की आपूर्ति हो सकती है। आपका बच्चा समस्या के बावजूद, अपने पोषक तत्वों की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो सकता है। लेकिन हां, इसके लिए आपको थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी और इसलिए हर कदम उठाने से पहले पेडिअट्रिशन से बात करना बहुत जरूरी है।
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