गर्भावस्था

जन्म दोष का पता लगाने के लिए गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग और टेस्ट

गर्भवती होने के बाद महिला के दिमाग में कई तरह के सवाल आ सकते हैं, जैसे कि क्या बच्चा ठीक रहेगा? यदि परिवार में क्रोमोसोम से जुड़ी असामान्यताओं का इतिहास रहा है या यदि आप 35 साल से अधिक उम्र की हैं, तो आप अधिक चिंतित हो सकती हैं। यह आपको स्पष्ट सवाल की ओर ले जाता है: कैसे पता लगाएं गर्भावस्था के दौरान होने वाले बर्थ डिफेक्ट्स के बारे में? 

हालांकि अच्छी खबर यह है कि यह दो तरीकों से यह संभव है: स्क्रीनिंग और डायग्नोस्टिक टेस्ट।

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जन्म दोष के लिए गर्भावस्था में स्क्रीनिंग क्यों की जाती है?

प्रीनेटल स्क्रीनिंग यह चेक करने के लिए की जाती है कि कहीं भ्रूण में कोई जेनेटिक असामान्यताएं विकसित होने का खतरा तो नहीं है। ये टेस्ट नॉन-इनवेसिव होते हैं और इन्हें करने में अधिक समय नहीं लगता है। दूसरी ओर डायग्नोस्टिक टेस्ट में कुछ जोखिम शामिल होते हैं और ये आक्रामक होते हैं जो जांच के लिए स्क्रीनिंग को पहला मार्ग बनाते हैं। यदि रिजल्ट पॉजिटिव है, तो डायग्नोस्टिक टेस्ट पर विचार किया जाता है जो बर्थ डिफेक्ट की पुष्टि करता है।

गर्भावस्था के स्क्रीनिंग टेस्ट

स्क्रीनिंग टेस्ट प्रेगनेंसी के पहली और दूसरी तिमाही के दौरान होते हैं।

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पहली तिमाही में

पहली तिमाही के दौरान टेस्ट नौवें और 13वें हफ्ते के बीच किया जाता है। इन टेस्ट में शामिल हैं:

1. ब्लड टेस्ट

आपको एक साधारण ब्लड टेस्ट करवाना होगा जो आपके खून में फ्री बी-एचसीजी और पीएपीपी-ए (प्लाज्मा प्रोटीन ए) जैसे कॉम्पोनेन्ट का विश्लेषण करेगा। ये दोनों बायोकैमिकल मार्कर हैं जो डाउन सिंड्रोम, पटाऊ सिंड्रोम और एडवर्ड सिंड्रोम के जोखिम से ग्रसित भ्रूण के बारे में जानकारी देते हैं।

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2. न्यूकल ट्रांसपेरेंसी

इस टेस्ट में, भ्रूण की गर्दन के पीछे तरल पदार्थ के संग्रह को चेक करने के लिए अल्ट्रासाउंड किया जाता है। बढ़ी हुई मोटाई का मतलब है कि भ्रूण को ट्राइसॉमी 21 और अन्य जेनेटिक असामान्यताओं का खतरा है। स्टडीज से पता चला है कि स्क्रीनिंग के इस मेथड में सिर्फ 80 प्रतिशत का पता लगाने की दर है और पांच प्रतिशत झूठी सकारात्मकता की संभावना है। यदि ऊपर बताया गया ब्लड टेस्ट किया जाता है तो यह 90 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।

ऊपर दिए गए टेस्ट न केवल जेनेटिक असामान्यताओं का पता लगाने में मदद करते हैं बल्कि गर्भावस्था से जुड़ी अन्य समस्याओं का भी पूर्वाभास कराते हैं। उदाहरण के लिए जैसे, माँ में कम पीएपीपी-ए, प्री-एक्लेमप्सिया, बच्चे की मौत और इंट्रायूटरिन के विकास में समस्याएं।

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दूसरी तिमाही में

दूसरी तिमाही के दौरान बहुत सारे टेस्ट एक साथ किए जाते हैं और इसे सामूहिक रूप से क्वाड मार्कर टेस्ट के रूप में जाना जाता है। यह चार बायोमार्करों के लेवल को मापता है जो भ्रूण में क्रोमोसोमल असामान्यताओं के जोखिम दिखाने में मदद करते हैं। दूसरी तिमाही के दौरान यह टेस्ट 14वें और 18वें हफ्ते के बीच किया जाता है। हालांकि, 22वें हफ्ते तक भी इसको किया जा सकता है।

1. अल्फा-फेटोप्रोटीन

यह प्लाज्मा प्रोटीन की मौजूदगी का विश्लेषण करता है जो कि अल्फा-फेटोप्रोटीन (एएफपी) के रूप में भ्रूण के लिवर में उत्पन्न होता है। प्रोटीन के हाई लेवल वाली महिलाओं में ऐसे बच्चे होते हैं जिनमें स्पाइना बिफिडा और एनेसेफली जैसे न्यूरल डिफेक्ट्स की संभावना बढ़ जाती है। दूसरी ओर, एएफपी के कम लेवल वाली महिलाओं को डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे पैदा होने का अधिक जोखिम होता है। हालांकि, यह टेस्ट अन्य टेस्ट के साथ किया जाना चाहिए ताकि सही रूप से एक सटीक जानकारी मिल सके।

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2. ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रोपिन

यह प्लेसेंटा में उत्पन्न होता है। जिन महिलाओं में इसका स्तर बढ़ा हुआ होता है, उनमें डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे होने की संभावना अधिक होती है।

3. एस्ट्रियोल

यह एस्ट्रोजन का एक प्रकार है जो भ्रूण और प्लेसेंटा दोनों द्वारा निर्मित होता है। टेस्ट में पाए जाने वाले असामान्य स्तर का मतलब यह होता है कि भ्रूण में डाउन सिंड्रोम, एडवर्ड सिंड्रोम या कुछ अन्य जेनेटिक असामान्यता होने का खतरा बढ़ जाता है।

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4. इन्हीबीन-ए

यह एक हार्मोन है जो प्लेसेंटा में पाया जाता है। स्टडीज से पता चला है कि डाउन सिंड्रोम और अन्य क्रोमोसोमल असामान्यताओं की पहचान दर में इस हार्मोन को मापने से नाटकीय रूप से सुधार हुआ है। आप पहली और दूसरी तिमाही के टेस्ट एक साथ करवा सकती हैं जिसे इंटीग्रेटेड स्क्रीनिंग टेस्ट के रूप में जाना जाता है।

गर्भावस्था के डायग्नोस्टिक टेस्ट

बर्थ डिफेक्ट्स की जांच एलिमिनेशन प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है। हालांकि स्क्रीनिंग प्रक्रिया अब खत्म हो गई है, लेकिन हमेशा गलत पॉजिटिव परिणाम मिलने की संभावना होती है। इसके अलावा, डायग्नोस्टिक टेस्ट आमतौर पर आक्रामक होते हैं और कुछ मामलों में जोखिम भरे भी होते हैं। यही कारण है कि डायग्नोस्टिक टेस्ट केवल तभी किए जाते हैं जब स्क्रीनिंग टेस्ट मध्यम से उच्च जोखिम का संकेत देते हैं।

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पहली तिमाही में

जन्म दोष का जल्दी कैसे पता लगाया जा सकता है? यह एक बेहद अच्छा सवाल है। नीचे बताया गया टेस्ट गर्भावस्था के 10वें और 13वें हफ्ते के बीच प्लान किया जाता है और यह सबसे पहला समय है जब आप निश्चित रूप से बर्थ डिफेक्ट का पता लगा सकती हैं।

1. कोरियोनिक विलस सैंपलिंग

इस टेस्ट के लिए कोरियोनिक विलस का एक सैंपल लिया जाता है जो प्लेसेंटा में पाया जाता है। यह प्लेसेंटा में प्रोजेक्शन जैसा होता है और अलग होता है क्योंकि उसमें भ्रूण के समान जीन होते हैं। इसका उपयोग डाउन सिंड्रोम या सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी क्रोमोसोमल असामान्यताओं का पता लगाने के लिए किया जाता है। हालांकि, यह न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट का पता लगाने में मदद नहीं करता है। इस डायग्नोस्टिक टेस्ट के कारण कुछ जोखिमों में गर्भपात, संक्रमण या बच्चे के पैर और उंगलियों में डिफेक्ट हो सकता है। यह टेस्ट बिलकुल सही है लेकिन कभी-कभी गलत-पॉजिटिव परिणाम दिखाता है। इसके अलावा, परिणाम कभी-कभी अस्पष्ट होते हैं, और आगे स्पष्टीकरण के लिए एमनियोसेंटेसिस की जरूरत पड़ती है। परिणाम का समय बदल सकता है और इसमें कुछ दिन या कुछ हफ्ते भी लग सकते हैं।

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दूसरी तिमाही में

जबकि कोरियोनिक विलस सैंपलिंग इसके बारे में जाने का एक तरीका होता है, यह सभी तरह के बर्थ डिफेक्ट का पता नहीं लगा सकता है। इसके अलावा, यदि आपका गर्भाशय पीछे की ओर झुका हुआ है और प्लेसेंटा भी गर्भाशय के पीछे स्थित है, तो कोरियोनिक टेस्ट को माना कर दिया जाता है। अंत में, यदि आपकी स्क्रीनिंग 13 हफ्ते के बाद पॉजिटिव आती है, तो आप नीचे दिए गए टेस्ट को आजमा सकती हैं। जहां एमनियोसेंटेसिस 15वें और 18वें हफ्ते के दौरान किया जाता है, वहीं अल्ट्रासाउंड 18वें और 20वें हफ्ते के बीच किया जाता है।

1. एमनियोसेंटेसिस

एमनियोटिक फ्लूइड में अल्फा-फेटोप्रोटीन या एएफपी नामक पदार्थ मौजूद होता है। पेट के जरिए से एक सुई को गर्भाशय में डाला किया जाता है। अब, भ्रूण को घेरने वाले तीस मिलीलीटर से कम एमनियोटिक फ्लूइड को हटा दिया जाता है और उसका विश्लेषण किया जाता है। यह टेस्ट डाउन सिंड्रोम, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, स्पाइना बिफिडा और सिकल सेल रोग का पता लगाने में उपयोगी है। इसकी सटीकता दर 99.4 प्रतिशत है, और 200 में से 1 महिला के टेस्ट के बाद गर्भपात होने का खतरा होता है। आपको तीन हफ्ते के अंदर परिणाम मिल जाएंगे।

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2. लेवल 2 अल्ट्रासाउंड

अल्ट्रासाउंड का यह रूप एक नियमित अल्ट्रासाउंड के समान ही होता है, लेकिन रिजल्ट अधिक टार्गेटेड होते हैं। दिमाग, हृदय और अन्य अंगों जैसे विशिष्ट जगहों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। इसका उपयोग डाउन सिंड्रोम का पता लगाने के लिए किया जाता है और यह एमनियोसेंटेसिस और कोरियोनिक विलस सैंपलिंग के विपरीत नॉन-इनवेसिव है। अल्ट्रासाउंड पूरा होने के बाद रिजल्ट मिल जाता है।

एमनियोसेंटेसिस और कोरियोनिक विलस सैंपलिंग दोनों आक्रामक हैं और आपको टेस्ट के बाद कम से कम कुछ दिनों के लिए कोई भी तेज व्यायाम करने की अनुमति नहीं होती है।

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कोई भी टेस्ट कराना यह आपकी पसंद होती है। हालांकि, ज्यादातर ऑब्सटेट्रिशियन का कहना है कि टेस्ट  करना बेहतर होता है ताकि प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले बर्थ डिफेक्ट्स के बारे में डर और चिंता आपके दिमाग से निकल जाए।

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समर नक़वी

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