5 और 6 महीने के छोटे बच्चे का रोजाना का रूटीन

5 और 6 महीने के छोटे बच्चे का रोजाना का रूटीन

जब आपकी जिंदगी में एक बच्चा आ जाता है, तो ऐसा लगता है जैसे आपकी रेगुलर जिंदगी में उथल-पुथल मच गई हो। अचानक एक छोटा सा इंसान आपके बीच आ जाता है, जिसे आपकी पूरी देखभाल, ध्यान और प्यार की जरूरत होती है और शुरुआत में एक रूटीन को फॉलो कर पाना नामुमकिन होता है। दिन भर में न जाने कितनी ही बार दूध पिलाना पड़ता है, डायपर बदलने पड़ते हैं और सुलाना पड़ता है। आप अपनी और अपने बच्चे की देखभाल की पूरी कोशिश कर रही होती हैं। 

लेकिन अब इसके लिए चिंता की कोई बात नहीं है। बच्चे के आने के बाद, कुछ सप्ताह के अंदर आप एक निश्चित डेली रूटीन की आदी हो जाती हैं और 2 महीनों के अंदर-अंदर बच्चे के साथ आपकी दिनचर्या, तेल डाली हुई एक मशीन जैसी चलने लगती है। हालांकि, जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है, आपको उसके डेली शेड्यूल में बदलाव करने होते हैं, जो कि उसके विकास में मदद करते हैं। 

एक शेड्यूल बनाना, अपने नन्हे बच्चे के विकास की प्लानिंग का एक जरूरी हिस्सा होता है। जिसके अंदर कई तरह की चीजें होती हैं, जैसे – एक्टिविटी टाइम, सोने का टाइम, घूमने का टाइम या खेलने का टाइम। इस बात का ध्यान रखें, कि आप अपने बच्चे के लिए जो शेड्यूल बनाती हैं, उसका असर उसके नींद के पैटर्न, व्यवहार और आदतों पर पड़ता है। 

नीचे दिए गए फैक्टर्स के अनुसार आपके बच्चे के शेड्यूल में बदलाव की जरूरत होती है: 

याद रखें, एक बच्चे के लिए शेड्यूल बनाने से, आप कम उम्र में ही उसे अनुशासन के साथ जीने की आदत डाल देती हैं, जो कि उसके विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके अलावा, नियमितता बहुत जरूरी है, इसलिए इस बात का ध्यान रखें, कि हर दिन अपने बच्चे के साथ एक ही रूटीन फॉलो करें। 

5 और 6 महीने के छोटे बच्चों की जरूरतें 

यहां पर, 5 से 6 महीने की उम्र के बच्चों की कुछ जरूरतें दी गई हैं। बच्चे के लिए शेड्यूल बनाने से पहले आपको इन पर विचार करना चाहिए: 

  • 4 से 6 महीने की उम्र के शिशु को आमतौर पर दिन भर में 14 घंटे की नींद की जरूरत होती है। इसमें दिन की नींद और रात की नींद दोनों ही शामिल हैं। विकास के दौरान आपके बच्चे के शरीर से खोई हुई एनर्जी को पूरा करने के लिए, उसे दिन भर में 2 बार और रात को जल्दी सोना चाहिए। 
  • इस उम्र में एक छोटा बच्चा एक दिन में लगभग एक लीटर ब्रेस्ट मिल्क पीता है। और दिन भर में कई बार दूध पिलाना अच्छा होता है। इससे फीडिंग के बीच-बीच में आपके शरीर को आराम करने का समय मिलता है और उसे वापस एनर्जी मिलती है। याद रखें, बच्चे का फीडिंग शेड्यूल कुछ ऐसा होना चाहिए, जो आपके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा हो। 
  • छोटे बच्चे के लिए मालिश बहुत जरूरी है। मालिश के कई फायदे होते हैं। इससे आपको बच्चे के शरीर पर मौजूद, चकत्तों, एलर्जी और दूसरी समस्याओं का पता चलता है। इससे ब्लड सर्कुलेशन बेहतर बनता है, जिससे मांसपेशियों के विकास की प्रक्रिया में तेजी आती है। इससे मांसपेशियों को मजबूत बनाने में भी मदद मिलती है, जिससे बच्चे को गर्दन उठाने, करवट लेने, हाथ-पैरों से चलने और तेजी से चलने में मदद मिलती है। हालांकि जरूरत से ज्यादा मालिश करने से मांसपेशियों को नुकसान भी हो सकता है, इसलिए सावधानी बरतें। 
  • इस उम्र में बच्चे के लिए खेलना बहुत जरूरी है, क्योंकि खेलने से बच्चे की मांसपेशियों में मजबूती आती है और वह अलग-अलग वस्तुओं और लोगों से इंटरैक्ट करना सीखता है। अपने बच्चे को नियमित रूप से खेलने के लिए समय देना जरूरी है, ताकि सही तरह से उसका विकास हो सके। 

5 और 6 महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली मां के लिए शेड्यूल 

बच्चे के लिए शेड्यूल बनाने के दौरान पहले यह समझना जरूरी है, कि आपके समय का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है। बच्चे के साथ अपने शेड्यूल का तालमेल बिठाने से, बच्चे के साथ आपका बिताया गया समय और भी अधिक खास बन जाता है, खासकर जब बात ब्रेस्टफीडिंग की आती है। 

शेड्यूल 1: अटैचमेंट पेरेंटिंग करने वाली मां के लिए 

शेड्यूल 1: अटैचमेंट पेरेंटिंग करने वाली मां के लिए

यह शेड्यूल उस माँ के लिए है, जो अटैचमेंट पेरेंटिंग स्टाइल को फॉलो करती है और जो अपने बच्चे को ब्रेस्टफीड भी करा रही है। यह पैटर्न बच्चे के बजाय माँ द्वारा फॉलो किया जाता है। यह शेड्यूल 6 महीने के बच्चे के लिए एक नमूना है।

  • सुबह 7:30 बजे: उठें और फ्रेश हो लें। बच्चे को जगाएं, कपड़े बदलें और दूध पिलाएं। 
  • 8 – 9:45 के बीच: प्ले टाइम या स्टोरी टाइम और सुबह का नाश्ता। अगर आपके बच्चे ने ठोस आहार लेने की शुरुआत कर दी है, तो उसे ठोस आहार का ब्रेकफास्ट देने के लिए यह अच्छा समय है। 
  • 10 – 11:45 के बीच: सोने का समय। सुलाने से पहले बच्चे का डायपर बदलना ना भूलें। नहा लें, खाना खा लें, ई-मेल चेक करें, घर के काम करें और लंच की तैयारी करें। 
  • 11:45 – 12 बजे: दूध पिलाना 
  • 12 – 2 के बीच: प्ले टाइम, टमी टाइम और दोपहर का खाना। 
  • 2 – 3 के बीच: दूसरा नैपटाइम। बच्चे का डायपर चेक करें। अगर वह दोपहर में अच्छी नींद नहीं सोया है, तो शाम के समय उसे 30 मिनट के लिए झपकी दिला दें (पर ध्यान रखें, यह समय उसके सोने के समय के पास नहीं होना चाहिए)। 
  • 3 – 5:30 के बीच: नैपटाइम के बाद फीडिंग और दोनों पेरेंट्स के साथ प्ले टाइम। ध्यान रखें, कि खेलने और देखभाल करने के लिए उसके पिता भी उसके साथ होने चाहिए। इससे आपको अपनी जरूरतों को पूरा करने और कोई जरूरी काम निपटाने के लिए समय मिल जाएगा और बच्चे को भी मां के साथ-साथ पिता का प्यार भी मिल पाएगा। अगर आप एक सिंगल पैरंट हैं, तो अपने किसी मित्र या बच्चे के नाना-नानी को ऐसा करने को कहें। 
  • 5:30 – 6 के बीच: रात की फीडिंग 
  • 7:30 – 8 के बीच: अगर जरूरत हो, तो सोने से पहले दूध पिलाएं। कहानियां सुनाएं और बच्चे को बिस्तर पर सुला दें। 
  • 10:30 के बीच: खुद सोने से पहले बच्चे को ड्रीम फीड कराएं। 

शेड्यूल 2: घर पर रहने वाली मां के लिए

घर पर रहने वाली मां को इस बात की सलाह दी जाती है, कि वह एक ऐसा शेड्यूल बनाए, जो कि फ्लेक्सिबल हो। फ्लेक्सिबल शेड्यूल में अनेक काम किए जा सकते हैं और बच्चे को रूटीन लीड करने का मौका मिलता है और अच्छी नींद लेने में मदद मिलती है। इस तरह के शेड्यूल से पैरंट को स्वतंत्रता के विकास में मदद मिलती है। 

शेड्यूल 2: घर पर रहने वाली मां के लिए

इस उम्र में, धीरे-धीरे आपको यह प्रयास करना चाहिए, कि बच्चे के दिन भर की फीडिंग के बीच की समय अवधि कम न हो कर, अधिक हो। यानी, उनके बीच के गैप को बढ़ा दिया जाए, जो कि नियमित हो। ऐसा करने से आपके 6 महीने के बच्चे के सोने का रूटीन नियमित हो जाएगा और उसे पूरी रात सोने में मदद मिलेगी। लेकिन याद रखें, एक फ्लेक्सिबल शेड्यूल को भी एक ठोस आधार चाहिए होता है। इसलिए एक अच्छे स्लीप टाइम और नैप टाइम को सेट करने की कोशिश करें। एक ठोस आधार के बिना फ्लेक्सिबिलिटी काम नहीं कर सकती है। इसके लिए आप शेड्यूल-1 के रूटीन को भी फॉलो कर सकती हैं और अपनी दिनचर्या के अनुसार टाइमिंग में बदलाव कर सकती हैं। 

शेड्यूल 3: वर्क फ्रॉम होम करने वाली मां के लिए

एक बच्चे के साथ वर्क फ्रॉम होम करना एक बड़ी चुनौती हो सकती है। खासकर अगर बच्चे की उम्र 5 से 6 महीने हो, तो बच्चे को बहुत सारे ध्यान की जरूरत होती है। अगर एक सही रूटीन न बनाया जाए, तो यह मां और बच्चे दोनों के लिए मुश्किल हो सकता है। 

शेड्यूल 3: वर्क फ्रॉम होम करने वाली मां के लिए

एक बेबी-लेड शेड्यूल यहां पर सही नहीं होगा। यहां पर पैरंट-लेड शेड्यूल का एक नमूना दिया गया है, जो कि घर से काम करने वाली मांओं के लिए उपयोगी हो सकते हैं: 

  • सुबह 7 बजे: उठें और फ्रेश हो जाएं। बच्चे को जगाएं, कपड़े बदलें और दूध पिलाएं। 
  • 7:30 – 8:30 के बीच: बच्चे के साथ खेलने के लिए थोड़ा समय निकालें। उसके लिए किताबें पढ़ें या थोड़ी तेल मालिश करें। 
  • 8:45 – 10 के बीच: बच्चे के सोने का समय। आप इस समय ब्रेकफास्ट कर सकती हैं, नहा सकती हैं और थोड़ा काम भी कर सकती हैं। 
  • 10 – 11 के बीच: बच्चे को नजरों के सामने रखें, उसे जमीन पर खेलने दें और आप अपना काम निपटा लें। 
  • 11- 12 के बीच: बच्चे के साथ खेलें। उसे थोड़ा टमी टाइम दें और उसके लिए किताब पढ़ें। 
  • 12 बजे: अगर आप बच्चे को ठोस आहार देने की कोशिश कर रही हैं, तो इस समय उसे ब्रेस्टफीड कराएं या फिर उसके साथ थोड़ा समय बताएं। 
  • 1 बजे: अगर आपका बच्चा बेबी फूड खाता है, तो उसे खाना खिलाए या नहीं, तो डायपर और दूध पिलाएं। 
  • 1:30 के बीच: बच्चे के सोने का समय। फिर से अपना बचा हुआ काम निपटा लें। 
  • 2:30 – 5:30 के बीच: अपना काम खत्म करने और दूध पिलाने और खेलने के बाद, बच्चे के पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अच्छा समय बिताएं। 
  • 5:30 – 6 के बीच: अंतिम फीडिंग
  • 7 – 8 के बीच: बच्चे का डायपर बदलें, कहानियां सुनाएं और बच्चे को सुलाएं। 

शेड्यूल 4: ब्रेस्ट पंपिंग करने वाली कामकाजी मांओं के लिए

वर्किंग मॉम के रूटीन की तरह ही, कामकाजी महिलाओं के लिए ब्रेस्टफीडिंग और बॉटल फीडिंग का कॉन्बिनेशन बड़े पैमाने पर पैरेंट-लेड होता है। 

शेड्यूल 4: ब्रेस्ट पंपिंग करने वाली कामकाजी मांओं के लिए

यह शेड्यूल, शेड्यूल-3 से काफी मिलता-जुलता है। इस रूटीन में, बॉटल फीडिंग और ब्रेस्टफीडिंग की सायकल बदलती रहती हैं। दिन भर के 4 फीडिंग सेशन में से, दो फीडिंग के दौरान बोतल का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। बच्चे के सोने के समय को ब्रेस्टमिल्क की पंपिंग के लिए इस्तेमाल करना ना भूलें। 

5 और 6 महीने के बच्चे को फार्मूला दूध पिलाने वाली मां के लिए शेड्यूल

फॉर्मूला फीडिंग, बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग कराने का एक विकल्प है, जिससे मां को थोड़ा बदलाव मिल जाता है। अगर मां बच्चे को ब्रेस्टफीड कराने में सक्षम नहीं है, तो भी वह बच्चे के जीवन के पहले एक वर्ष के दौरान जरूरी पोषक तत्वों की आपूर्ति कर सकती है। ऐसी मान्यता है, कि बच्चे को फॉर्मूला देने से बच्चे को बेबी फूड की शुरुआत करने में आसानी होती है। लेकिन इसके लिए पर्याप्त मेडिकल सबूत उपलब्ध नहीं हैं। 

शेड्यूल 5: घर पर रहने वाली मां के लिए 

घर पर रहकर ब्रेस्टफीडिंग कराने का एक सबसे बड़ा फायदा यह है, कि मां जब चाहे बच्चे को दूध पिलाने में सक्षम होती है। हम घर पर रहने वाली मां को एक फीड-ऑन-डिमांड शेड्यूल का इस्तेमाल करने की सलाह देंगे, क्योंकि उसे घर के काम और बच्चे को मैनेज करने के लिए समय चाहिए होता है। 

शेड्यूल 5: घर पर रहने वाली मां के लिए

ऐसे में मां को बच्चे के साथ बहुत सारा समय और फ्लेक्सिबिलिटी मिल जाती है। जब उसे भूख लगती है, तब उसे दूध पिलाया जा सकता है। सुविधा के लिए माँ फॉर्मूला मिल्क फटाफट तैयार करके पिला सकती है। 

शेड्यूल 6: घर पर रहने वाली जुड़वां बच्चों की मां के लिए 

जुड़वां बच्चों को दूध पिलाना एक चुनौती भरा काम हो सकता है, जिसमें बहुत थकान हो सकती है। ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली मां को बहुत अच्छी तरह से खाना खाने की जरूरत होती है, ताकि उसके शरीर में पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ दूध का निर्माण हो सके। वहीं फार्मूला देने वाली मांओं के लिए चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं, क्योंकि उसके ब्रेस्ट दो छोटे मुंह को फीड करने के तनाव से नहीं गुजर रहे होते हैं। अगर आप अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए फार्मूला का इस्तेमाल कर रही हैं, तो आपको इस बात पर ध्यान देना चाहिए, कि घर पर अच्छी मात्रा में फार्मूला मौजूद हो और इमरजेंसी के लिए फ्रिज में थोड़ा एक्स्ट्रा दूध तैयार पड़ा हो। 

शेड्यूल 6: घर पर रहने वाली जुड़वां बच्चों की मां के लिए 

ऐसी परिस्थिति के लिए एक बेबी-लेड, फीड-ऑन-डिमांड शेड्यूल की सलाह दी जाती है, क्योंकि इससे जुड़वां बच्चों के दूध पीने के समय में थोड़ी दूरी आने में मदद मिलती है। रेगुलर फीडिंग्स के साथ-साथ इस बात का भी ध्यान रखें, कि दोनों ही बच्चे परिवार के साथ अच्छा समय बिताएं और उन्हें बराबर मात्रा में मालिश, खेलना और टमी टाइम मिल सके। 

शेड्यूल 7: वर्किंग मां के लिए

शेड्यूल 7: वर्किंग मां के लिए

जब जिम्मेदारियों की बात आती है, तो एक कामकाजी मां संभवतः इनसे सबसे अधिक जूझती है। यहां पर एक कामकाजी मां के लिए रिकमेंडेड शेड्यूल दिया गया है: 

  • सुबह 7 बजे: उठें और फ्रेश हो लें। फॉर्मूला का बोतल तैयार करें। बेबी को जगाएं, उसे तैयार करें और दूध पिलाएं। 
  • 7:30 – 9 के बीच: ब्रेकफास्ट करें। बच्चे और परिवार के साथ अच्छा समय बिताएं। 
  • 9 – 5 के बीच: बच्चे को आया या दादा/दादी के पास या डे केयर में छोड़ें। अगर आपका बच्चा डे केयर में रहता है, तो वहां पर दिन भर कुछ ना कुछ एक्टिविटीज कराई जाती हैं और बच्चे के सामाजिक गुणों का विकास होने में मदद मिलती है, जो कि बहुत जरूरी होते हैं। इस दौरान मां काम पर जाती है। इसलिए ऐसा डे केयर चुनें, जो आपके पेरेंटिंग स्टाइल और प्राथमिकताओं के अनुसार सही हो। 
  • 5 – 6 के बीच: बच्चे के साथ अच्छा समय बताएं और दूध पिलाएं। 
  • 6 – 7 के बीच: माता-पिता के साथ खेलने का समय। खासकर पिता या पिता समान किसी व्यक्ति के साथ खेलना। 
  • 7 – 8 बजे: डायपर बदलना (या पिता को करने दें। इससे बराबरी की एक भावना जागृत होगी और जिम्मेदारियां भी बंट जाएंगी) कहानियां सुनाना और बच्चे को सुलाना। 

शेड्यूल 8: इवनिंग शिफ्ट में काम करने वाली मां के लिए

शेड्यूल 8: इवनिंग शिफ्ट में काम करने वाली मां के लिए

ऐसी मां के लिए जो फॉर्मूला फीडिंग करवाती है, इवनिंग शिफ्ट में काम करना उपयोगी है। यहां पर एक रेकमेंडेड शेड्यूल का नमूना दिया गया है: 

  • 7:30 बजे: उठें और फ्रेश हो लें। बच्चे को जगाएं, दूध पिलाएं और कपड़े बदलें। 
  • 8 – 9:45 के बीच: बच्चे के साथ खेलना, टमी टाइम या कहानियां या किताबें पढ़ना। 
  • 10 – 11:45 के बीच: सोने का समय, घर के काम और खाना पकाना। 
  • 12 – 1 के बीच: मां और बच्चे का क्वालिटी टाइम और दोपहर का खाना। 
  • 1 – 2 के बीच: मां और बच्चे के सोने का समय। 
  • 2 – 4 के बीच: दूध पिलाने का समय। डायपर बदलना और खेलना या किताबें पढ़ना। 
  • 5 बजे: इस दौरान पिता को बच्चे की देखभाल करने दें और माँ तैयार होकर काम पर जा सकती है। 
  • 6 बजे: बच्चे का डिनर टाइम। 
  • 7 – 8 के बीच: थोड़ा टमी टाइम, डायपर बदलना, कहानियां सुनाना, फिर बच्चे को सुलाना। 

5 और 6 महीने के छोटे बच्चों के लिए रूटीन तय करने के टिप्स

यहां पर कुछ टिप्स दिए गए हैं, जिनकी मदद से आप अपने बच्चे के लिए शेड्यूल तैयार कर सकते हैं: 

  • अपने और पति के शेड्यूल बनाएं। 
  • आप यह चुन सकती हैं, कि आप कैसा शेड्यूल चाहती हैं, बेबी-लेड या पैरेंट-लेड यानी बच्चे के अनुसार या खुद के अनुसार। 
  • रेगुलैरिटी बनाए रखें, शेड्यूल की किसी भी एक्टिविटी को छोड़ें नहीं। 
  • कुछ महीनों के अंतराल पर शेड्यूल में थोड़े बदलाव करती रहें। 
  • अगर संभव हो, तो थोड़ा समय मिलने पर मेडिटेशन करने की कोशिश करें। 
  • अपने पति के साथ अकेले समय बिताने की नियमित योजना बनाएं। 
  • पति के साथ तालमेल बिठाएं, ताकि कभी-कभी वे बच्चे को संभाल सकें और आप अपने लिए थोड़ा समय निकाल सकें। 

एक शेड्यूल बनाना, आपके और बच्चे दोनों के लिए ही दिन का एक जरूरी हिस्सा है। इससे आपको अनुशासन और समझदारी के साथ, रोज के कामकाज को ऑर्गेनाइज करने में मदद मिल सकती है। बच्चे की जरूरतों का ध्यान रखें, जैसे – उसका खाना-पीना, उसकी नींद और खेलने का समय। साथ ही शेड्यूल बनाने से पहले ठोस आहार की शुरुआत करने पर भी विचार करें। इस प्रक्रिया में गलतियां होती रहती हैं, लेकिन आपके लिए जो शेड्यूल सही हो, उसे ढूंढें और उसे फॉलो करें और फ्लेक्सिबल बने रहें। 

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